बावरी साहिबा  

बावरी साहिबा निर्गुण ब्रह्मा की उपासिका थीं। उन्हें 'बावरीपंथ' की संस्थापिका माना जाता है। उनकी साधना उच्च कोटि की थी, इसीलिए लोगों ने उन्हें 'साहिबा' कहकर आदर तथा मान-सम्मान दिया। बावरी साहिबा के अद्भुत परमात्मा-प्रेम और अलौकिक साधना ने जो साधना पद्धति चलाई, उसे बीरू साहब, यारी साहब, बुल्ला साहब, गुलाल साहब, जगजीवन साहब, भीखा साहब, पल्टू साहब जैसे संतों ने आगे बढ़ाया।[1]

समय काल

बावरी साहिबा का पूरा जीवन-वृत्तान्त नहीं मिलता। इतना अवश्य कहा जाता है कि उनका काल बादशाह अकबर से पूर्व का ही कोई समय था। यह भी कहा जाता है कि वे दिल्ली के किसी उच्च कुलीन घराने की थीं। किन्तु परमात्मा के प्रति इनकी प्रीत ने इन्हें भक्ति का दीवाना बना दिया।

प्रेम दीवानी

बावरी साहिबा प्रेम दीवानी थीं। संसार के सारे सुख-ऐश्वर्य, घर-द्वार, लोकलाज त्यागकर वे ‘प्रेम दीवानी’ होकर घूमने लगी थीं। परमात्मा को ‘प्रीतम’ मानकर उसके प्रेम में पागल होकर वह निकल पड़ी थीं। वह न किसी विशेष पहनावे में विश्वास करती थीं, न ही कोई तिलक लगातीं, न ही पूजा पाठ करती थीं। वह निर्गुण उपासना करती थीं। परमात्मा से मिलने की प्रार्थना करतीं और उसी का ध्यान करती थीं।[1]

बावरी रावरी का कहिये, मन ह्वै कै पंतग भरै नित भांवरी।
भांवरी जनहिं संत सुजन जिन्हें हरिरूप हिये दरसाव री।
सांवरी सूरत, मोहनी मूरत, दैकर ज्ञान अनन्त लखाव री।
खावरी सौंह, तिहारी प्रभू गति रखरी देखि भई मति बावरी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 बावरी साहिबा (हिन्दी) हिन्दुस्तान लाइव। अभिगमन तिथि: 09 जून, 2015।

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