प्रभुदत्त ब्रह्मचारी  

प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
पूरा नाम संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
जन्म 1885
जन्म भूमि अलीगढ़, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 1990
मृत्यु स्थान वृन्दावन, मथुरा
पति/पत्नी पण्डित मेवाराम तथा अयुध्यादेवी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र ब्रजभाषा के प्रकाण्ड विद्वान् तथा आध्यात्म के पुरोधा।
मुख्य रचनाएँ 'भारतीय संस्कृति व शुद्धि', 'श्री श्री चैतन्य चरितावली', 'महाभारत के प्राण महात्मा कर्ण', 'बद्रीनाथ दर्शन', 'मुक्तिनाथ दर्शन', 'महावीर हनुमान' आदि।
भाषा संस्कृत, हिन्दी, ब्रजभाषा
प्रसिद्धि साधना, समाज सेवा, संस्कृति, साहित्य, स्वाधीनता, शिक्षा आदि के समर्पित पोषक एवं प्रेरणा-स्रोत।
नागरिकता भारतीय
जेल यात्रा महात्मा गाँधी के आह्वान पर प्रभुदत्त जी ने पढ़ाई छोड़ दी तथा स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। अंग्रेज़ों के विरुद्ध आन्दोलनों में सक्रिय भाग लिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें कठोर कारावास का दण्ड भोगना पड़ा।
विशेष प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ब्रजभाषा के सिद्धहस्त कवि थे। उन्होंने सम्पूर्ण 'भागवत' को महाकाव्य के रूप में छन्दों में लिखा था। 'भागवत चरित कोश' ब्रजभाषा में लिखने का एकमात्र श्रेय इन्हीं को प्राप्त है।
अन्य जानकारी भारत की आज़ादी के बाद राजनेताओं की विचारधारा से दु:खी होकर प्रभुदत्तजी सदा के लिए राजनीति से अलग हो गए थे और झूसी में 'हंसस्कूल' नामक स्थान पर वट वृक्ष के नीचे तप करने लगे थे।

संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी (अंग्रेज़ी: Prabhudutt Brahmachari; जन्म- 1885 ई., अलीगढ़, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 1990, वृन्दावन, मथुरा) संस्कृत, हिन्दी और ब्रजभाषा के प्रकाण्ड विद्वान् तथा आध्यात्म के पुरोधा थे। वे साधना, समाज सेवा, संस्कृति, साहित्य, स्वाधीनता, शिक्षा आदि के समर्पित पोषक एवं प्रेरणा-स्रोत थे। उनके जीवन के चार मुख्य संकल्प थे- 'दिल्ली में हनुमान जी की 40 फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना', 'राजधानी स्थित पांडवों के क़िले (इन्द्रप्रस्थ) में भगवान विष्णु की 60 फुट ऊंची प्रतिमा की स्थापना', 'गौहत्या पर प्रतिबंध' तथा 'श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति'। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी इस सदी के महान् संत थे। उन्होंने सतत्‌ नाम संकीर्तन की ज्योति जलाकर सदैव देश और समाज की समृद्धि की कामना की थी। गौरक्षा, गंगा की पवित्रता, हिन्दी भाषा, भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म की सेवा उनके जीवन के परम लक्ष्य थे। उन्होंने गौरक्षा के मुद्दे पर अनेक अनशन, आन्दोलन तथा यात्राएं की थीं।

जन्म तथा शिक्षा

प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का जन्म संवत 1942 (1885 ई.) में जनपद अलीगढ़, उत्तर प्रदेश के ग्राम अहिवासी नगला में एक निर्धन परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित मेवाराम था। विदुषी माता अयुध्यादेवी से संत सुलभ संस्कार प्राप्त कर उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया था। बल्देव, बरसाना, खुर्जा, नरवर एवं वाराणसी में उन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया। स्वामी करपात्री जी एवं साहित्यकार कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर उनके सहपाठी थे। वे 'श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव' मंत्र के द्रष्टा थे। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी का व्यक्तित्व विलक्षण और विराट था। छोटी अवस्था में ही वे गृह त्यागकर गुरुकुल में रहे, जहाँ शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की। बचपन से ही सांसारिकता से विरक्त रहे ब्रह्मचारी जी ने तप को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया था। वे संस्कृत साहित्य का गहरा अध्ययन करते रहे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. लाल कालीन पर नकली भगवानों की खड़ाऊं (हिन्दी) पत्रकार। अभिगमन तिथि: 09 नवम्बर, 2014।
  2. संत समाज के सुमेरु व महान् व्यक्तित्व: प्रभुदत्त ब्रह्मचारी (हिन्दी) संत। अभिगमन तिथि: 09 नवम्बर, 2014।

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