जीव गोस्वामी  

जीव गोस्वामी

पूर्व बंगाल के बरिशाल ज़िले का एक अंश कभी चन्द्रद्वीप नाम से प्रसिद्ध था। चन्द्र द्वीप के एक अंश बाकला में रूप-सनातन के पिता कुमारदेव की अट्टालिका थी। रूप-सनातन और उनके छोटे-भाई वल्लभ जब हुसैनशाह के दरवार में सर्वोच्च पदों पर नियुक्त थे, तब इस अट्टालिका का गौरव किसी राजप्रासाद से कम न थां धन-धान्य, राजैश्वर्य, बन्धु-बान्धवों, दास-दासियों से परिपूर्ण और तरू-लताओं, बाग-बगीचों से परिवेष्टित इस अट्टालिका की शोभा देखते ही बनती थी।

पर जब से तीनों भाई संसार छोड़कर चले गये मानो इसने भी वैराग्य ले लियां इसकी चमक-दमक और चहल-पहल अतीत के गर्भ में विलीन हो गयी। पुर-परिजनों और दास-दासियों का कलगुंजन भी अब इसमें सुनाई नहीं पड़ता। सुनाई पड़ता है नितान्त नीरवता के वातावरण में एक वर्षीय-सी विधवा का मन्द स्वर, जो रात्रि के अन्धकार में दीपशिखा के निकट बैठी पुराण का पाठ करती है और उसके शिशु का कलकंठ, जो उससे सटकर बैठा बड़े ध्यान से पुराण की कहानियाँ सुनता है और बीच-बीच में उचक-उचक कर विस्फारित नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए रहस्यमय प्रश्न करता है।

विधवा माँ के नयनमणि यह बालक है वल्लभ का एकमात्र पुत्र जीव इसकी बुद्धि की तीक्षणता और परमार्थ विषयों में असाधारण रुचि इसके प्रश्नों से साफ़ झलकती है। इसने अपने परिवार से उत्तराधिकार में पाया ही और क्या है? न तो इसने पाया है अपने पिता और पितृव्यों का राजवैभव, न उनके किसी सिंहासन का उत्तराधिकार। पायी है केवल उनकी विवेक बुद्धि और उनकी भक्ति की अदम्य स्पृहा। इसके बल-बूते पर ही इसे उत्तरकाल में करतलगत हुआ भक्ति का विराट साम्राज्य। इसके बल पर ही यह उदित हुआ वृन्दावन धाम में भक्ति-आन्दोलन के केन्द्र में भक्ति-सिद्धान्त और साधना के आलोक स्तम्भ के रूप में और परिचित हुआ गौड़ीय-वैष्णव समाज के महान् शक्तिधर अधि नायक श्रीजीव गोस्वामी के रूप में।

जन्म

जीव के जन्म काल का अनुमान भक्तिरत्नाकर की निम्न पंक्तियों के आधार पर लगाया जाता है-

श्री जीवादि संगोपने प्रभुरे देखिल।

अति प्राचीनेर मुखे ए सब शुनिल॥[1]

श्रीनरहरि चक्रवर्ती के इस उल्लेख का आशय जान पड़ता है कि जीव बहुत छोटी अवस्था के शिशु थे और अधिकतर माँ के साथ या उनकी गोद में रहते थे जब उन्होंने महाप्रभु के दर्शन किये। महाप्रभु जब 1513 ई. या 1514 ई. में रामकेलि गये तो उनके साथ उनकी माँ और अन्य महिलाओं ने छिपकर कहीं से उनके दर्शन किये। नरहरि चक्रवर्ती ने यह भी लिखा है कि उन्होंने किसी बहुत प्राचीन या वृद्ध व्यक्ति के मुख से ऐसा सुना, जिसने स्वयं उस समय महाप्रभु के दर्शन किये थे। श्रीसतीशचन्द्र मिश्रका कहना है कि उस समय जीव की उम्र यदि दो वर्ष मानी जाय तो मानना होगा कि उनका जन्म सन् 1511 ई. में रामकेलि में हुआ।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भक्तिरत्नाकर 1/638
  2. सप्त गोस्वामी, पृ0 204।
  3. भक्तिरत्नाकर 1/644
  4. भक्तिरत्नाकर 1/724-725
  5. भक्तिरत्नाकर 1/639
  6. भक्तिरत्नाकर 1/639) 1/643
  7. भक्तिरत्नाकर (1/639) (1/643) (1/102
  8. भक्तिरत्नाकर (1/639) (1/643) (1/102) (4/699-700
  9. भक्तिरत्नाकर (1/639) (1/643) (1/102) (4/699-700) (1/734-735
  10. भक्तिरत्नाकर (1/639) (1/643) (1/102) (4/699-700) (1/734-735) (1/736-737
  11. भक्तिरत्नाकर 1/772
  12. भक्तिरत्नाकर 1/119
  13. श्रीसतीशचन्द्र मित्र और शंकरराय आदि कुछ लोगों का मत है कि यह वल्लभ भट्ट विष्णुस्वामी सम्प्रदाय के श्रीपाद वल्लभाचार्य थे (दे. सप्त-गोस्वामी पृ. 214; भारतेर-साधक, खण्ड 5, पृ. 165)। ऐतिहासिक दृष्टि से श्रीपाद वल्लभाचार्य का जीव गोस्वामी से मिलन सम्भव जान पड़ता है। पर इस सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। श्रीपादवल्लभाचार्य का अन्तर्धान हुआ सन् 1531 (सम्वत् 1587) में, मतान्तर से सन् 1533 में (Dasgupta: History of Indian Philosophy, Vol. IV, Cambridge, 1949, p-372) जीव गोस्वामी संसार त्यागकर नवद्वीप होते हुए काशी पहुँचे सन् 1528 में। दो वर्ष श्री मधुसूदन वाचस्पति से वेदान्त अध्ययन कर वृन्दावन आगमन का समय बिल्कुल निश्चित नहीं है। यदि उन्होंने गृह-त्याग एक-दो वर्ष बाद किया, या काशी में वेदान्त-अध्ययन के लिए दो वर्ष से अधिक रहे, तो उनका वृन्दावन-आगमन श्रीपादवल्लभाचार्य के अन्तर्धान के पश्चात् ही हो सकता है।
  14. भक्ति रसामृतसिन्धु 1/2/22
  15. भक्तिरत्नाकर 5/1637
  16. भक्तिरत्नाकर 5/1641-1643
  17. "श्री रूप डाकिया कहे श्रीजीवेर प्रति। अकाले वैराग्य वेश धरिले मूढ़मति॥
    क्रोधेर उपरे क्रोध ना इहल तोमार। ते कारणे तोर मुख ना देखिब आर॥"
  18. भक्तिरत्नाकर 5/1652
  19. भक्तिरत्नाकर 4/290
  20. भक्तिरत्नाकर 4/293
  21. भक्तिरत्नाकर 4/294-296
  22. District Memoirs of Mathura, 3rd Ed.( p. 241
  23. हरिदास: गौड़ीय वैरुष्णव साहित्य, परिशिष्ट, पृ0 90
  24. सप्तगोस्वामी, पृ0 179
  25. भक्तिरत्नाकर 11/201-202

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