ललितकिशोरी और नथुनीबाबा  

भक्तों में एक 'सखी सम्प्रदाय' प्रचलित है। इसमें अपने को भगवान की आज्ञाकारिणी सखी मानकर और भगवान श्रीकृष्ण को अपन प्रियतम सखा समझकर उपासना की जाती है। इस सम्प्रदाय का विश्‍वास है कि सखी भाव से उपासना किये बिना किसी को निकुंज सेवा का अधिकार नहीं प्राप्‍त होता।

सर्वमान्य भक्त

भक्त प्रवर साह जी और नथुनीबाबा, ये दोनों 'सखी सम्प्रदाय' में सर्वमान्‍य भक्त हो गये हैं। साह जी वृन्दावन में ललितनिकुंज के भीतर रहते थे और ‘ललितकिशोरी’ नाम से प्रसिद्ध थे। नथुनीबाबा ब्राह्मण कुल भूषण थे। आप परम रसिक, नि:स्‍पृह, सदा प्रसन्‍न और भगवान की रूपरसमाधुरी में नित्‍य छके रहने वाले थे। वृन्‍दावन में आप सखी भाव से रहते थे। भगवत्‍संगी ही आपके प्रिय थे और भगवान राधारमण ही परमाराध्‍य देव थे। आप सदा नथ धारण करते थे, इसी से ‘नथुनीबाबा’ के नाम से आपकी प्रसिद्धि हो गयी थी।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 भक्त चरितांग |प्रकाशक: गीताप्रेस गोरखपुर |संकलन: भारतकोश डिस्कवरी पुस्तकालय |संपादन: हनुमान प्रसादजी पोद्दार |पृष्ठ संख्या: 436 |
  2. 'दारी' प्रेम की गाली है, जार पति से मिलने वाली स्‍त्री के लिये इस शब्‍द का प्रयोग होता है। परकीया-प्रेमोपासना के कारण ऐसा कहा जाता है।

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