गया  

गया
महाबोधि मंदिर, बोधगया
विवरण झारखंड और बिहार की सीमा और फल्गु नदी के तट पर बसा गया बिहार का एक प्रमुख नगर है।
राज्य बिहार
ज़िला गया
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 24°45′; पूर्व- 85°01′
मार्ग स्थिति गया बोधगया से 17 किलोमीटर, नालंदा से 101 किलोमीटर, राजगीर से 78 किलोमीटर, पटना से 135 किलोमीटर, वाराणसी से 252 किलोमीटर, कलकत्ता से 495 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
कैसे पहुँचें हवाई जहाज, रेल, बस, टैक्सी
हवाई अड्डा गया हवाई अड्डा
रेलवे स्टेशन गया रेलवे स्टेशन
बस अड्डा गया बस अड्डा
यातायात टैक्सी, ऑटो-रिक्शा, साइकिल रिक्शा
कहाँ ठहरें होटल, अतिथि ग्रह, धर्मशाला
एस.टी.डी. कोड 0-631
ए.टी.एम लगभग सभी
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
संबंधित लेख बोधगया, महाबोधि मंदिर, श्राद्ध
भाषा हिंदी और भोजपुरी
अन्य जानकारी कहा जाता है कि श्राद्ध के समय में यहाँ फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है।
बाहरी कड़ियाँ आधिकारिक वेबसाइट

गया (अंग्रेज़ी: Gaya) झारखंड और बिहार की सीमा और फल्गु नदी के तट पर बसा बिहार का एक प्रमुख नगर है। वाराणसी की तरह गया की प्रसिद्धि मुख्य रूप से एक धार्मिक नगरी के रूप में है। पितृपक्ष के अवसर पर यहाँ हज़ारों श्रद्धालु पिंडदान के लिये जुटते हैं। गया सड़क, रेल और वायु मार्ग द्वारा पूरे भारत से अच्छी तरह जुड़ा है। नवनिर्मित 'गया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा' द्वारा यह थाइलैंड से भी सीधे जुड़ा हुआ है। गया से 17 किलोमीटर की दूरी पर बोधगया स्थित है जो बौद्ध तीर्थ स्थल है और यहीं 'बोधिवृक्ष' के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

मान्यता

गया बिहार के महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थानों में से एक है। यह शहर ख़ासकर हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिए काफ़ी मशहूर है। यहाँ का 'विष्णुपद मंदिर' पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है। दंतकथाओं के अनुसार भगवान विष्णु के पांव के निशान पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। हिन्दू धर्म में इस मंदिर को अहम स्थान प्राप्त है। गया पितृदान के लिए भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहाँ फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। आधुनिक काल में भी सभी धार्मिक हिन्दुओं की दृष्टि में गया का विलक्षण महत्त्व है। इसके इतिहास प्राचीनता, पुरातत्त्व-सम्बन्धी अवशेषों, इसके चतुर्दिक पवित्र स्थलों, इसमें किये जाने वाले श्राद्ध-कर्मों तथा गया वालों के विषय में बहुत-से मतों का उद्घोष किया गया है। गया के विषय में सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है 'गयामाहात्मय'।[1] विद्वानों ने गयामाहात्मय के अध्यायों की प्राचीनता पर सन्देह प्रकट किया है। राजेन्द्रलाल मित्र ने इसे तीसरी या चौथी शताब्दी में प्रणीत माना है। ओ' मैली ने 'गयासुर की गाथा' का आविष्कार 14वीं या 15वीं शताब्दी का माना है, क्योंकि उनके मत से गयावाल वैष्णव हैं, जो मध्वाचार्य द्वारा स्थापित सम्प्रदाय के समर्थक हैं और हरि नरसिंहपुर के महन्त को अपना गुरु मानते हैं किन्तु यह मत असंगत है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वायुपुराण, अध्याय 105-112
  2. ऋग्वेद 10।63।17 एवं 10।64।17
  3. दैवी पुरोहित गय द्वारा प्रशंसित हुए
  4. अथर्ववेद, 1।14।4
  5. ऋग्वेद 7।99।4, 7।104।24—25 एवं अथर्ववेद 4।23।5
  6. निरूक्त 12।19
  7. ऋग्वेद 1।22।17
  8. विष्णु
  9. त्रेधा निधत्ते पदम्। पृथिव्यामन्तरिक्षे दिवीति शाकपूणि:। समारोहणे गयाशिरसि-इति और्णवाभ:। निरूक्त (12।19)।
  10. अधिकांश संस्कृत-विद्वान् निरूक्त को कम-से-कम ई.पू. पाँचवीं शताब्दी का मानते हैं। और्णवाभ निरूक्त के पूर्वकालीन हैं। विंटरनित्ज का हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर, भाग 1, पृ0 69, अंग्रेज़ी संस्करण। गयाशीर्ष के वास्तविक स्थल एवं विस्तार के विषय में विद्वान् एकमत नहीं हैं। डॉ. राजेन्द्रलाल मित्र कृत 'बुद्ध-गया' (पृ. 19), डॉ. बरूआ (भाग 1,पृ. 246) एवं सैकेड बुक ऑफ दि ईस्ट, जिल्द 13, पृ. 134, जहाँ कनिंघम ने 'गयासीस' को बह्मयोनि माना है
  11. महाभारत, वनपर्व 87।11 एवं 95।9
  12. विष्णुधर्मसूत्र 85।4, यहाँ 'गयाशीर्ष' शब्द आया है
  13. विष्णु पुराण 22।20, जहाँ इसे ब्रह्मा की पूर्व वेदी कहा गया है
  14. महावग्ग 1।21।1, जहाँ यह आया है कि उरवेला में रहकर बुद्ध सहस्त्रों भिक्षुओं के साथ गयासीस अर्थात् गयाशीर्ष में गये
  15. भविष्य के बुद्ध
  16. विष्णुधर्मसूत्र 85।40
  17. महरौली देहली से 9 मील उत्तर, के लौह-स्तम्भ के लेख का अन्तिम श्लोक यों है- 'तेनायं प्रणिधाय भूमिपतिना.... प्रांशुर्विष्णुपदे गिरौ भगवतो विष्णोर्ध्वज: स्थापित:' (गुप्ताभिलेख, सं. 32, पृ. 149)। यह स्तम्भाभिलेख किसी चन्द्र नामक राजा का है। इससे प्रकट होता है कि 'विष्णुपद' नामक कोई पर्वत था। किन्तु यह नहीं प्रकट होता कि इसके पास कोई 'गयाशिरस्' नामक स्थल था। अत: 'विष्णुपद' एवं 'गयशिर' साथ-साथ गया की ओर संकेत करते हैं। अभिलेख में कोई तिथि नहीं है, किन्तु इसके अक्षरों से प्रकट होता है कि यह समुद्रगुप्त के काल के आस-पास का है। अत: विष्णुपद चौथी शताब्दी में देहली के पास के किसी पर्वत पर रहा होगा। उसी समय या उसके पूर्व में यह वर्णन आया है कि विपाशा नदी के दक्षिण में एक विष्णुपद था।
  18. पक्षियों के स्वर से गंजित
  19. महाभारत, वनपर्व 84।82-103 एवं 95।9-21
  20. महाभारत, वनपर्व अध्याय 82
  21. श्लोक 20-40
  22. स्थाणुतीर्थ
  23. महाभारत, वनपर्व (84।1।89)
  24. पद्म पुराण (आदि, 38।2-19)
  25. यथा 84।59-64 एवं 87।6-7
  26. यथा 85।82-103 एवं 87।8-12
  27. महाभारत (अनुशासन पर्व 25।42)
  28. वायु पुराण (109।15)
  29. महाभारत, वनपर्व अध्याय 84 एवं 95
  30. अग्नि पुराण अध्याय 114-116
  31. वायु पुराण अध्याय 105-111
  32. पद्म पुराण आदि, 38।2-21
  33. गरुड़ पुराण 1, अध्याय 82-86
  34. नारद पुराण उत्तर, अध्याय 44-47
  35. महाभारत वन 82।81
  36. पद्म. आदि, 38।13
  37. लगभग-13 मील
  38. मौनादित्यसहस्त्रलिंगकमलार्धागींणनारायण,-- द्विसोमेश्वरफल्गुनाथविजयादित्याह्वयानां कृती। स प्रासादमचीकरद् दिविषदां केदारदेवस्य च, ख्यातस्योत्तरमानसस्य खननं सत्रं तथा चाक्षये॥ इण्डियन ऐण्टीक्वेरी, जिल्द 16, पृ. 63
  39. (मानस सरोवर)
  40. वायु पुराण 77।108, और यह श्लोक कल्पतरू द्वारा 1110 ई. में उद्धृत किया गया है, पुन: वायु पुराण (82।21) एवं अग्नि पुराण (115।10)
  41. वायु पुराण, अध्याय 105-112
  42. उत्तर, अध्याय 44-47
  43. वायु पुराण 82।20-24
  44. (भोजन, आहार)
  45. एष्टव्या बहव: पुत्रा यधेकोपि गयां व्रजेत्। यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सुजेत्॥ महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप। यत्रासौ कोर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वट:॥ यत्र दत्तं पितृभ्योन्नमक्षय्यं भवति प्रभो। सा च पुच्यजला तत्र फल्गुनामा महानदी॥ महाभारत, वनपर्व (87।10-12); राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते। नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी॥...ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान। अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम्॥ वनपर्व और एष्टव्या... नामक श्लोक के लिए विष्णुधर्मसूत्र (85। अन्तिम श्लोक), मत्स्य पुराण (22।6), वायु पुराण (105।10), कूर्म पुराण (2।35।12), पद्म पुराण पद्म पुराण (1।38।17 एवं 5।11।62) तथा नारदीय पुराण (उत्तर 44।5-6) (वनपर्व 87।10-12)
  46. वनपर्व (अध्याय 87)
  47. वनपर्व अध्याय 95
  48. यह ज्ञातव्य है कि रामायण (1।32।7) के अनुसार धर्मारण्य की संस्थापना ब्रह्मा के पौत्र, कुश के पुत्र असूर्तरय (या अमूर्तरय) द्वारा हुई थी।
  49. वसिष्ठधर्मसूत्र (111।42)
  50. विष्णुधर्मसूत्र (85।65-67)
  51. शंख 14।27-28
  52. यह कुछ आश्चर्यजनक है कि डॉ. बरूआ (गया एवं बुद्धगया, जिल्द 1, पृ. 66) ने शंख के श्लोक 'तीर्थे वामरकण्टके ' में 'वामरकण्टक' तीर्थ पढ़ा है न कि 'वा' को पृथक् कर 'अमरकण्टक'!
  53. अग्नि पुराण 115।46-47
  54. मत्स्य पुराण 22।4-6
  55. वायुपुराण, अध्याय 105-112
  56. वायु. (105।7-8) एवं अग्न. (114।41)-- 'गयोपि चाकरोद्यार्ग बह्वन्नं बहुदक्षिणम्। गयापुरी तेन नाम्ना, त्रिस्थलीसेतु (पृ. 340-341) में यह पद्य उद्धृत है।
  57. यहीं पर "एष्टव्या बहव: पुत्रा यद्येकोपि गयां व्रजेत्।... उत्सृजेत्" (वायु पुराण 105।10) नामक श्लोक आया है। त्रिस्थली (पृ. 319) में एक श्लोक उद्धृत किया है जिसमें योग्य पुत्र की परिभाषा दी हुई है-- 'जीवतो वाक्यकरणात्..... त्रिभि: पुत्रस्य पुत्रता॥'
  58. आत्मजोवान्यजो वापि गयाभूमौ यदा यदा। यन्नाम्ना पातयेत्पिण्डं तन्नयेद् ब्रह्म शाश्वतम्॥ नामगोत्रे समुच्चार्य पिण्डपातनभिष्यते। (वायु. 105।14-15); आधा पाद 'यन्नाम्ना... शाश्वतम्' अग्नि पुराण (116।21) में भी आया है।
  59. ब्रह्मज्ञानं गयाश्राद्धं गोग्रहे मरणं तथा। वास: पुसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषा चतुर्विधा॥ ब्रह्मज्ञानेन किं कार्य... यदि पुत्रो गयां ब्रजेत॥ गयायां सर्वकालेषु पिण्डं वद्याद्विचक्षण:। वायु पुराण (105।16-18)। अग्नि पुराण (115।8) 'न कालादि गयातीर्थे दद्यात्पिण्डांश्च नित्यश:।' नारदीय पुराण (उत्तर, 44।20), अग्नि पुराण (115।3-4 एवं 5-6) एवं वामन पुराण (33।8)
  60. मुण्डनं चोपवासश्च... विरजां गयाम्॥ वायु पुराण 105।25
  61. दण्डं प्रदर्शयेद् भिक्षुर्गयां गत्वा न पिण्डद:। दण्डं न्यस्य विष्णुपदे पितृभि: सहमुच्यते॥ वायु पुराण 105।26, नारदीय पुराण एवं तीर्थप्रकाश (पृ. 390)
  62. पंचकोशं गयाक्षेत्रं कोशमेकं गयाशिर:। तन्मध्ये सर्वातीर्थानि त्रैलोक्ये यानि सन्ति वै॥ वायु पुराण (105।29-30 एवं 106।653; त्रिस्थली.,पृ. 335; तीर्थप्र.,पृ. 391)। और अग्नि पुराण (115।42) एवं नारदीय पुराण (उत्तर, 44।16)। प्रसिद्ध तीर्थों के लिए पाँच कोसों का विस्तार मानना एक नियम-सा हो गया है।
  63. पिण्डसनं पिण्डदानं पुन: प्रत्यवनेजनम्। दक्षिणा चान्नसंकल्पस्तीर्थश्राद्धेष्वयं विधि:॥ नावाहनं न दिग्बन्धो न दोषो दृष्टिसम्भव:।... अन्यत्रावाहिता: काले पितरो यान्त्यमुं प्रति। तीर्थे सदा वसन्त्येते तस्मादावहनं न हि॥ वायु पुराण (105।37-39)।'नावाहनं...विधि:' फिर से दुहराया गया है (वायु पुराण 110।28-29)
  64. गयायां न हि तत्स्थानं यत्र तीर्थ न विद्यते। वायु पुराण 105।46, अग्नि पुराण 116।28
  65. अग्नि पुराण (114।8-22) में भी शिला की गाथा संक्षेप में कही गयी है। बहुत-से शब्द वे ही हैं जो वायु पुराण में पाये जाते हैं।
  66. बोधगया, पृ. 15-16
  67. शिव का भक्त
  68. जो श्रेष्ठ राजा एवं विष्णु-भक्त था
  69. कूर्म पुराण 1।16।59-60 एवं 91-92
  70. पद्म पुराण भूमिखण्ड, 1।8
  71. इस पुराण ने उसे महाभागवत कहा है
  72. वामन पुराण अध्याय 7-8
  73. अंगुत्तरनिकाय, भाग 4, पृ. 197-204
  74. असुरेन्द्र

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