कथावत्थु  

कथावत्थु स्थविर मोग्गलिपुत्त तिस्स की लिखी हुई एक स्थविरवादी रचना है, जिसका समय लगभग तीसरी शताब्दी ई.पू. माना जाता है। इस ग्रंथ में विरोधी संप्रदायों के 216 सिद्धांतों का खंडन है, जिसे 23 अध्यायों में विभक्त किया गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि 'कथावत्थु' में कुछ अशोक परवर्ती संप्रदायों के दार्शनिक सिद्धांतों का निराकरण मिलता है।

बुद्ध का निर्वाण

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 100 वर्ष बाद वज्जिपुत्तक भिक्षुओं ने संघ के अनुशासन का उल्लंघन किया और 'महासंघिक' नामक संप्रदाय की स्थापना की, जिसमें पाँच और शाखाओं का उद्भव बाद में हुआ। पहले जिस बौद्ध धर्म को 'प्रथम बौद्ध संगीति' में एक निश्चित रूप प्राप्त हुआ था, उसमें अशोक के समय तक आते-आते 11 संप्रदाय और उदित हो गए थे। इस प्रकार सब मिलाकर, ऐसा माना जाता है कि ई.पू. तीसरी शताब्दी तक बौद्ध धर्म में कुल 18 संप्रदाय प्रचार में आ चुके थे।[1]

अशोक द्वारा सभा बुलाना

इतने वैभिन्य और विवाद को देखकर मूल बौद्ध धर्म की स्थापना के लिए अशोक ने बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद 253 अथवा 246 ई.पू. में पाटलिपुत्र में बौद्ध भिक्षुओं की एक सभा बुलाई, जिसके सभापति स्थविर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने 18 निकायों में से केवल 'थेरवाद' या 'स्थविरवाद' को मूल बौद्ध धर्म मानकर शेष 17 निकायों के दार्शनिक सिद्धांतों का निराकरण किया और उसे 'कथावत्थुप्पकरण' नामक ग्रंथ में प्रस्तुत किया। यह ग्रंथ उसी समय से 'अभिधम्मपिटक' का अंग माना जाने लगा।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 कथावत्थु (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 27 फ़रवरी, 2014।

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