शान्तरक्षित बौद्धाचार्य  

आचार्य शान्तरक्षित सुप्रसिद्ध स्वातन्त्रिक माध्यमिक आचार्य थे। उन्होंने 'योगाचार स्वातन्त्रिक माध्यमिक' दर्शनप्रस्थान की स्थापना की। उनका एक मात्र ग्रन्थ 'तत्त्वसंग्रह' संस्कृत में उपलब्ध है। उन्होंने 'मध्यमकालङ्कार कारिका' नामक माध्यमिक ग्रन्थ एवं उस पर स्ववृत्ति की भी रचना की थी। इन्हीं में उन्होंने अपने विशिष्ट माध्यमिक दृष्टिकोण को स्पष्ट किया। किन्तु ये ग्रन्थ संस्कृत में उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन उसका भोट भाषा के आधार पर संस्कृत रूपान्तरण 'तिब्बती-संस्थान', सारनाथ से प्रकाशित हुआ था, जो उपलब्ध है।

जन्म तथा काल

आचार्य शान्तरक्षित 'वङ्गभूमि' (आधुनिक बंगलादेश) के ढाका मण्डल के अन्तर्गत विक्रमपुरा अनुमण्डल के 'जहोर' नामक स्थान में क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए थे। ये नालन्दा के निमन्त्रण पर तिब्बत गये थे और वहाँ बौद्ध धर्म की स्थापना की। आठवीं शताब्दी प्राय: इनका काल माना जाता है।

शिष्य

आचार्य कमलशील और आचार्य हरिभद्र शान्तरक्षित के प्रमुख शिष्य थे। आचार्य हरिभद्र विरचित 'अभिसमयालङ्कार' की टीका 'आलोक' संस्कृत में उपलब्ध है। यह अत्यन्त विस्तृत टीका है, जिसमें 'अभिसमयालङ्कार' की स्फुटार्था टीका भी लिखी है, जो अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है। तिब्बत में अभिसमय के अध्ययन के प्रसंग में उसी का पठन-पाठन प्रचलित है। उसका भोट भाषा से संस्कृत में रूपान्तरण हो गया है और यह 'केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान', सारनाथ से प्रकाशित है।

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