तिब्बत  

पोटाला महल, ल्हासा (तिब्बत)

तिब्बत मध्य एशिया का प्रमुख पठार है। सातवीं शताब्दी में तिब्बत के राजा स्त्रोङ्गचन्-स्त्राम्-पो (लगभग 626-98 ई.) ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया और थोवमी-सम्भोटा नामक तिब्बती विद्वान् को भारत भेजा, जिसने बौद्ध धर्म सम्बन्धी कुछ ग्रंथ इकट्ठे किए और पश्चिमी गुप्त लिपि को तिब्बत ले गया, जो देवनागरी लिपि से काफ़ी मिलती जुलती थी। यही लिपि तिब्बती वर्णमाला का आधार बनी। सम्भव है बुद्ध अवलोकितेश्वर की चंदन की प्रसिद्ध मूर्ति जो अब तक दलाईलामा के राजमहल पोताला में प्रतिष्ठापित है पूजी जाती है, वह सर्वप्रथम थोवमी के द्वारा तिब्बत ले जायी गयी हो। राजा स्त्रोङ्गचन् ने न केवल बौद्ध धर्म ग्रहण किया बल्कि थोवमी का शिष्य बनकर विद्याध्ययन भी किया। सातवीं शताब्दी में ही तिब्बत ने नेपाल पर आधिपत्य स्थापित कर लिया।

बौद्ध धर्म का प्रचार

राजा स्त्रोङ्गचन् तिब्बती लोगों में बौद्ध धर्म का प्रचार करके उनमें सत्यवादिता, दया, पवित्र एवं सादा जीवन, विद्धानों का आदर और मातृभूमि प्रेम आदि गुणों का विकास किया। इस प्रकार बौद्ध धर्म ने तिब्बत के सांस्कृतिक और आर्थिक विकास में पर्याप्त योगदान किया। संस्कृत ग्रंथों के तिब्बती भाषा में अनुवाद का जो कार्य स्त्रोङ्गचन्-स्त्राम्-पो के द्वारा प्रारम्भ किया गया था, वह उसके उत्तराधिकारियों द्वारा आगे बढ़ाया गया और इससे तिब्बती भाषा प्रांजल एवं समर्थ साहित्यिक माध्यम के रूप में निकलकर सामने आयी। बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार ने तिब्बत और भारत के बीच घनिष्ठ सम्पर्क स्थापित कर दिया।

प्रार्थना चक्र, ल्हासा (तिब्बत)

तिब्बती लोग बौद्ध धर्म के भारतीय शिक्षा केन्द्रों, विशेषतः नालंदा और विक्रमशिला आने लगे और इसी तरह भारतीय लोग तिब्बत जाने लगे। आने जाने का यह सिलसिला तिब्बत और भारत के सांस्कृतिक सम्बन्धों का एक नियमित अंग बन गया। बौद्ध धर्म के महान् आचार्यों शान्तरक्षित और पद्मसंभव ने तिब्बत की यात्राएँ 8वीं शती के मध्य में और अतिशा ने 11 वीं शताब्दी के मध्य में कीं। इस सांस्कृतिक सम्पर्क से तिब्बत में लामावाद की स्थापना और विकास हुआ। लामावाद ने बौद्ध धर्म के हीनयान, महायान और तंत्रयान सम्प्रदायों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। इसने तिब्बतियों के राष्ट्रीय चरित्र में परिवर्तन करके उन्हें धीरे-धीरे युद्धप्रिय से शांतिप्रिय धर्मभीरु व्यक्ति बना दिया। इसने उनके बीच अनेक आध्यात्मिक गुरु, प्रकांड विद्वान्, सुयोग्य भाषाविद्, और ऊँचे साधक उत्पन्न किये।

संस्कृत ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद करने का तिब्बती और भारतीय विद्वानों का प्रयास अत्यधिक सफल सिद्ध हुआ और बहुत से संस्कृत ग्रंथ जिनकी मूल प्रतियाँ अब भारत में नहीं पायी जाती हैं, या तो मूल रूप में या तिब्बती अनुवाद के रूप में तिब्बत में उपलब्ध हुए हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पहले तो 75 वार्षिक क़िस्तों में देने की बात तय हुई, किन्तु बाद में इसे घटाकर 25 लाख रुपया कर दिया गया और उसे तीन वार्षिक क़िस्तों में अदा करने की बात तय हुई, हर्ज़ाने का भुगतान न होने तक अंग्रेज़ों को सिक्कम और भूटान के मध्य स्थित चुम्बी घाटी पर अधिकार करने, किसी विदेशी शक्ति को तिब्बत का भूभाग न देने तथा उसे तिब्बत में रेलवे लाइन बिछाने की इज़ाज़त उस समय तक न देने जब तक की उसी प्रकार की सुविधाएँ ब्रिटिश सरकार को न दी जाएँ
  2. तिब्बत में झील (हिंदी) cri-online। अभिगमन तिथि: 19 मई, 2013। 
  3. 1962 ई. में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के सम्बन्ध अभी तक सामान्य नहीं हो पाए हैं)।

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