अठारह बौद्ध निकाय  

  • भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के अनन्तर बुद्धवचनों में प्रक्षेप (अन्य वचनों को डाल देना) और अपनयन (कुछ बुद्धवचनों को हटा देना) न होने देने के लिए क्रमश: तीन संगीतियों का आयोजन किया गया। प्रथम संगीति बुद्ध के परिनिर्वाण के तत्काल बाद प्रथम वर्षावास के काल में ही राजगृह में महाकाश्यप के संरक्षकत्व में सम्पन्न हुई। इसमें आनन्द ने सूत्र (इसमें अभिधर्म भी सम्मिलित है) और उपालि ने विनय का संगायन किया। इस तरह इस संगीति में सम्मिलित पाँच सौ अर्हत भिक्षुओं ने प्रथम बार बुद्धवचनों को त्रिपिटक आदि में विभाजन किया। भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद सौ वर्ष बीतते-बीतते आयुष्मान यश ने वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं को विनय विपरीत दस वस्तुओं का आचरण करते हुए देखा, जिसमें सोने-चाँदी का ग्रहण भी एक था। अनेक भिक्षुओं की दृष्टि में उनका यह आचरण अनुचित था। इसका निर्णय करने के लिए द्वितीय संगीति बुलाई गई। महास्थविर रेवत की अध्यक्षता में सम्पन्न इस संगीति में सम्मिलित सात सौ अर्हत भिक्षुओं ने उन (वज्जिपुत्तक भिक्षुओं) का आचरण विनयविपरीत निश्चित किया। वैशाली के वज्जिपुत्तक भिक्षुओं ने महास्थविरों के इस निर्णय को अमान्य कर दिया और कौशाम्बी में एक पृथक् संगीति आयोजित की, जिसमें दस हज़ार भिक्षु सम्मिलित हुए थे। यह सभा 'महासंघ' या 'महासंगीति' कहलाई तथा इस सभा को मानने वाले 'महासांघिक' कहलाए।
  • इस प्रकार बौद्ध संघ दो भागों या निकायों में विभक्त हो गया, स्थविरवादी और महासांघिक। आगे चलकर भगवान के परिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद सम्राट अशोक के काल में आयोजित तृतीय संगीति के समय तक बौद्ध संघ अठारह निकायों में विकसित हो गया था।
  • महासांघिक भी कालान्तर में दो भागों में विभक्त हो गए-
  1. एकव्यावहारिक और
  2. गोकुलिक।
  • गोकुलिक से भी दो शाखाएं विकसित हुई, यथा-
  1. प्रज्ञप्तिवादी और
  2. बाहुलिक या बाहुश्रुतिक।
  • बाहुलिक से चैत्यवादी नामक एक और शाखा प्रकट हुई। इस तरह महासांघिक से पाँच शाखाएं निकली, जो महासांघिक के साथ कुल 6 निकाय होते हैं।
  • दूसरी ओर स्थविरवादी भी पहले दो भागों में विभक्त हुए, यथा- वज्जिपुत्तक और महीशासक। वज्जिपुत्तक 4 भागों में विभक्त हुए, यथा-
  1. धर्मोत्तरीय,
  2. भद्रयाणिक,
  3. छन्रागरिक (षाण्णागरिक) और
  4. सम्मितीय।
  • महीशासक से भी दो शाखाएं विकसित हुई, यथा-
  1. धर्मगुप्तिक और
  2. सर्वास्तिवादी।
  • सर्वास्तिवादियों से क्रमश: काश्यपीय, काश्यपीय से सांक्रान्तिक और सांक्रान्तिक से सूत्रवादी सौत्रान्तिक निकाय विकसित हुए। इस प्रकार स्थविरवादी निकाय से 11 निकाय विकसित हुए, जो स्थविरवादी निकाय के साथ कुल 12 होते हैं। दोनों प्रकार के निकायभेद मिलकर कुल अठारह निकाय होते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: 1:2
  2. योग: समाधि: 1:1 पर भाष्य
  3. योगो युक्ति: समाधनम् 1:1 पर भोजवृत्ति
  4. अंगु. चतुक्कनिपात 2-46

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