तक्षशिला  

तक्षशिला
जौलियन मठ, तक्षशिला
विवरण 'तक्षशिला' प्राचीन भारत में गांधार देश की राजधानी और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।
वर्तमान देश रावलपिण्डी, पाकिस्तान
उल्लेख रामायण में इसे भरत द्वारा राजकुमार तक्ष के नाम पर स्थापित बताया गया है, जो यहाँ का शासक नियुक्त किया गया था।
इतिहास ईरान के सम्राट दारा के 520 ई.पू. के अभिलेख में पंजाब के पश्चिमी भाग पर उसकी विजय का वर्णन है। यदि यह तथ्य हो तो तक्षशिला भी इस काल में ईरान के अधीन रही होगी।
अन्य जानकारी महाभारत युद्ध के बाद राजा परीक्षित के वंशजों ने कुछ पीढ़ियों तक यहाँ अपना अधिकार बनाए रखा और जनमेजय ने अपना नागयज्ञ भी यहीं किया था।[1]

तक्षशिला प्राचीन भारत में गांधार देश की राजधानी और शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ का विश्वविद्यालय विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में शामिल है। यह हिन्दू एवं बौद्ध दोनों के लिये महत्वपूर्ण केन्द्र था। चाणक्य यहाँ पर आचार्य थे। 405 ई. में फाह्यान यहाँ आया था। तक्षशिला वर्तमान समय में पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिण्डी ज़िले की एक तहसील है।

इतिहास

तक्षशिला आधुनिक ‘तक्षिता’ का प्राचीन नाम है। खुदाई होने पर यह नगर रावलपिंडी के समीप निकला है। महाभारत के अनुसार यह नगरी गांधार में होनी चाहिए। भरत के पुत्र तक्ष की राजधानी यहीं थी और जनमेजय ने सर्प यज्ञ भी यहीं किया था। तक्षशिला प्राचीन समय का विख्यात विद्यापीठ था तथा संसार प्रसिद्ध कूटनीतिज्ञ चाणक्य (कौटिल्य) यहीं का था।[2]

गंधर्वदेश

तक्षशिला के अवशेष

गांधार की चर्चा ऋग्वेद से ही मिलती है, किंतु तक्षशिला की जानकारी सर्वप्रथम वाल्मीकि रामायण से होती है। अयोध्या के राजा राम की विजयों के उल्लेख के सिलसिले में हमें यह ज्ञात होता है कि उनके छोटे भाई भरत ने अपने नाना केकयराज अश्वपति के आमंत्रण और उनकी सहायता से गंधर्वों के देश (गांधार) को जीता और अपने दो पुत्रों को वहाँ का शासक नियुक्त किया। गंधर्व देश सिंधु नदी के दोनों किनारे स्थित था।[3] और उसके दानों ओर भरत के तक्ष और पुष्कल नामक दोनों पुत्रों ने तक्षशिला और पुष्कलावती नामक अपनी-अपनी राजधानियाँ बसाई।[4] तक्षशिला सिंधु के पूर्वी तट पर थी। उन रघुवंशी क्षत्रियों के वंशजों ने तक्षशिला पर कितने दिनों तक शासन किया, यह बता सकना कठिन है। कालिदास ने रघुवंश 15,89 में भी इसी तथ्य का उल्लेख किया है।[5] तक्षशिला का वर्णन महाभारत में परीक्षित के पुत्र जनमेजय द्वारा विजित नगरी के रूप में है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, स्वर्गारोहण पर्व, अध्याय 5
  2. पौराणिक कोश |लेखक: राणा प्रसाद शर्मा |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 557, परिशिष्ट 'क' |
  3. सिंधोरुभयत: पार्श्वे देश: परमशोभन:, वाल्मीकि रामायण, सप्तम, 100-11
  4. रघुवंश पंद्रहवाँ, 88-9; वाल्मीकि रामायण, सप्तम, 101.10-11; वायुपुराण, 88.190, महाभारत, प्रथम 3.22)।
  5. 'स तक्षपुष्कलौ पुत्रौ राजधान्यौ तदाख्ययौ, अभिषिच्याभिषेकार्ही रामान्तिकमगात् पुन:।'
  6. महाभारत, स्वर्गारोहण पर्व, अध्याय 5
  7. हैमिल्टन और फाकनर का अंग्रेजी अनुवाद, तृतीय, पृष्ट 90
  8. उद्यालक तथा सेतकेतु जातक
  9. टामस-बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र-भूमिका पृ. 15
  10. पृ. 107
  11. दे. एंशेंट जैन हिम्स, पृ.55
  12. महाभारत 1.3.20

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