सारनाथ  

सारनाथ विषय सूची
सारनाथ
सारनाथ स्तूप
विवरण वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला वाराणसी
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 25° 22' 52" - पूर्व- 83° 01' 17"
मार्ग स्थिति राष्ट्रीय राजमार्ग 28 सारनाथ को अनेक शहरों से जोड़ता है।
प्रसिद्धि भगवान बुद्ध का मन्दिर
कब जाएँ अक्टूबर से मार्च
कैसे पहुँचें टैक्सी, बस, रेल आदि
हवाई अड्डा सारनाथ का निकटतम हवाई अड्डा बाबातपुर, वाराणसी में है जो सारनाथ से 30 किलोमीटर की दूरी पर है।
रेलवे स्टेशन सारनाथ का निकटतम रेलवे स्टेशन वाराणसी केंट है जो लगभग 6 किलोमीटर दूर है। सारनाथ का भी एक रेलवे स्टेशन है लेकिन उस पर कम ही रेलगाड़ी रुकती हैं।
बस अड्डा सारनाथ के आस-पास के अनेक शहरों से सारनाथ जाने के लिए नियमित बसों की सुविधा उपलब्ध है।
यातायात विमान, रेल, बस, टैक्सी
क्या देखें अशोक का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, धमेख स्तूप, चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर आदि।
कहाँ ठहरें होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
एस.टी.डी. कोड 0542
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
भाषा हिन्दी और अंग्रेज़ी

सारनाथ काशी से सात मील पूर्वोत्तर में स्थित बौद्धों का प्राचीन तीर्थ है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने प्रथम उपदेश यहाँ दिया था, यहाँ से ही उन्होंने "धर्म चक्र प्रवर्तन" प्रारम्भ किया, यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर है, यहाँ सावन के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। यह जैन तीर्थ है और जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर बताया है। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुयें-अशोक का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धमेख स्तूप, चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार हैं, मुहम्मद ग़ोरी ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया था, सन 1905 में पुरातत्त्व विभाग ने यहाँ खुदाई का काम किया, उस समय बौद्ध धर्म के अनुयायियों और इतिहासवेत्ताओं का ध्यान इस पर गया।

परिचय

काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था।

सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। सिंहों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्त्व कम हो गया था। मृगदाय में सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया।

धमेख स्तूप, सारनाथ

प्राचीन नाम

इसका प्राचीन नाम ऋषिपतन (इसिपतन या मृगदाव) (हिरनों का जंगल) था। ऋषिपतन से तात्पर्य ‘ऋषि का पतन’ से है जिसका आशय है वह स्थान जहाँ किसी एक बुद्ध ने गौतम बुद्ध भावी संबोधि को जानकर निर्वाण प्राप्त किया था।[1] मृगों के विचरण करने वाले स्थान के आधार पर इसका नाम मृगदाव पड़ा, जिसका वर्णन निग्रोधमृग जातक में भी आया है।[2] आधुनिक नाम ‘सारनाथ’ की उत्पत्ति ‘सारंगनाथ’ (मृगों के नाथ) अर्थात् गौतम बुद्ध से हुई।

बोधिसत्व की कथा से संबंध

जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। वोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सार-या सारंग (मृग)- नाथ कहने लगे। रायबहादुर दयाराम साहनी के अनुसार शिव को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बी.सी. भट्टाचार्य, दि हिस्ट्री आफ़ सारनाथ, (बनारस, 1924), पृ. 47
  2. निग्रोध मृग जातक, संख्या 12 (फाउसबोल संस्करण
  3. चूँकि खुदाई उस समय हुई थी जब स्तरीकरण के सिद्धांत शोधकर्ताओं द्वारा प्रयुक्त नहीं किए जाते थे तथा तत्कालीन विद्वान् कच्ची ईंटों, फूस की झोपड़ियों आदि अवशेषों पर ध्यान नहीं देते थे, साथ ही भारतीय मृतिकापात्रों का विशेष अध्ययन, जो अब हो रहा है, उसका प्रचलन नहीं था। ऐसी स्थिति में संभव है उसके महत्त्व का उचित मूल्याँकन न कर सके हों।
  4. इपिग्राफ़िया इंडिका, भाग 9, पृ. 325
  5. आर्कियोलाजिकल् सर्वे ऑफ़ इंडिया, वार्षिक रिपोर्ट 1907-8, पृ. 78
  6. तत्रैव, 1904-5, पृ. 212
  7. कनिंघम, आर्कियोलाजिकल् सर्वे रिपोर्ट्स भाग 1, पृ. 111
  8. दयाराम साहनी ने आभिलेखिक आधार पर इसे सातवीं या आठवीं शताब्दी का माना है। कैटलाग ऑफ़ दि म्यूजियम ऑफ़ आर्कियोलाजी एट सारनाथ, (कलकत्ता 1914), पृ. 11
  9. बंगाल एशियाटिक सोसाइटी जर्नल, 1854, पृ. 469
  10. एशियाटिक सोसाइटी रिसर्चेज्, 1856, पृ. 369
  11. आर्कियोलाजिकल् सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-5, पृ. 59 और आगे।
  12. बी. मजूमदार, ए गाइड टू सारनाथ, (दिल्ली, 1937), पृ. 25
  13. आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ् इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1914-15 (1920) पृ. 97 और आगे।
  14. तत्रैव, 1919-20 (1922), पृ. 26 और आगे: तत्रैव, 1921-22, पृ.82 और आगे: तत्रैव 1927 (1931), पृ. 92
  15. विद्वानों का पहले ऐसा मत था कि यह मंदिर से पानी निकालने के लिए एक नाली थी। उत्खनन से यह निश्चित हो गया कि यह एक सुरंग थी जो एक कमरे में जाती थी, जहाँ बौद्ध भिक्षु एकांत साधना करते थे।
  16. सेमुअल बील, चाइनीज एकाउंट्स् आफ् इंडिया, भाग 3, पृ. 297
  17. आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ् इंडिया, (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-05, पृ. 74 जर्नल यू.पी.हि.सो., भाग 15, पृ. 55-64
  18. एशियाटिक रिसर्चेज, 5, पृ. 131-132 देखें- मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृ. 54
  19. आर्कियोलाजिकल् सर्वे आफ् इंडिया, वार्षिक रिपोर्ट, 1903-04, पृ. 221
  20. थामस वाटर्स, आन् युवान् च्वाँग्स् ट्रेवेल्स् इन इंडिया, भाग दो, पृ. 47
  21. आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ् इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1905-06, पृ. 68
  22. आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-5, पृ. 69
  23. तत्रैव, पृ. 70
  24. तत्रैव, 1907-08, पृ. 45
  25. आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृ. 46
  26. जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि इन कमरों में बौद्ध भिक्षु एकांत साधना करते थे।
  27. आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृ. 54
  28. आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1907-08, पृ. 56
  29. तत्रेव, पृ. 59। रचना में ये तीनों संघाराम सारनाथ के अन्य विहारों से मिलते-जुलते हैं। संभवत: ये विहार कुषाण काल में निर्मित हुए और इनका वर्तमान स्वरूप गुप्तकाल में प्राप्त हुआ। अत: यह निश्चित है कि ये संघाराम पहले 5वीं शताब्दी में हूणों के आक्रमण से नष्ट हुआ। तदुपरांत छठी शताब्दी में पुन: इनका जीर्णोद्धार हुआ जो पुन: 11 वीं शताब्दी में मुसलमानों के आक्रमण से नष्ट हो गया।
  30. आर्कियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (वार्षिक रिपोर्ट), 1904-05, पृ. 74
  31. वी. जायसवाल, अकथा : ए सैटेलाइअ सेटिलमेन्ट ऑफ़ सारनाथ, वाराणसी (रिपोर्ट ऑफ़ एक्सकैवेशन्स कन्डक्टेड इन द इयर 2002), भारती, अंक 26, 2000-2002, पृ. 61-180.
  32. पियवग्ग, बग्ग: 16, बुद्धघोष-रचित टीका
  33. चौखंडी स्तूप के निर्माता का ठीक-ठीक पता नहीं है। कनिंघम ने इस स्तूप का उत्खनन द्वारा अनुसंधान किया भी था, किंतु कोई अवशेष न मिले
  34. आर्कियालोजिकल रिपोर्ट 1904-05

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