संस्कृत भाषा और साहित्य  

संस्कृत भाषा और साहित्य का विश्व में अपना एक विशिष्ट स्थान है। विश्व की समस्त प्राचीन भाषाओं और उनके साहित्य (वाङ्‌मय) में संस्कृत का ख़ास महत्व है। यह महत्व अनेक कारणों और दृष्टियों से है। भारत के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, अध्यात्मिक, दर्शनिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन एवं विकास के सोपानों की संपूर्ण व्याख्या संस्कृत वाङ्‌मय के माध्यम से आज उपलब्ध है।

भारत की सांस्कृतिक भाषा

सहस्राब्दियों से संस्कृत भाषा और इसके वाङ्‌मय की भारत में सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त रही है। भारत की यह सांस्कृतिक भाषा रही है। सहस्राब्दियों तक समग्र भारत को सांस्कृतिक और भावात्मक एकता में आबद्ध रखने को इस भाषा ने महत्वपूर्ण कार्य किया है। इसी कारण भारतीय मनीषा ने इस भाषा को 'अमरभाषा' या 'देववाणी' के नाम से सम्मानित किया है।[1]

साहित्य निर्माण

ऋग्वेद काल से लेकर आज तक इस भाषा के माध्यम से सभी प्रकार के वाङ्‌मय का निर्माण होता आ रहा है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी के छोर तक किसी न किसी रूप में संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन अब तक होता चला आ रहा है। भारतीय संस्कृति और विचारधारा का माध्यम होकर भी यह भाषा अनेक दृष्टियों से धर्मनिरपेक्ष रही है। धार्मिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक और मानविकी आदि प्राय: समस्त प्रकार के वाङ्‌मय की रचना इस भाषा में हुई है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 संस्कृत भाषा और साहित्य (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 27 फरवरी, 2015।
  2. प्रागादर्शात्प्रत्यक्कालकवनाद्दक्षिणेन हिमवंतमुत्तरेण वारियात्रमेतस्मिन्नार्यावर्तें आर्यानिवासे..... (महाभाष्य, 6।3।109)
  3. वैदिक संस्कृत, अवस्ता अर्थात्‌ प्राचीनतम पारसी ग्रीक, प्राचीन गॉथिक तथा प्राचीनतम जर्मन, लैटिन, प्राचीनतम आइरिश तथा नाना वेल्ट बोलियाँ, प्राचीनतम स्लाव एवं बाल्टिक भाषाएँ, अरमीनियन, हित्ती, बुखारी आदि।
  4. जिसे मूल आर्यभाषा, आद्य आर्यभाषा, इंडोजर्मनिक भाषा, आद्य-भारत-योरोपीय भाषा, फादरलैंग्वेज आदि।
  5. दोनों ही शतवात्तक शब्द
  6. जिनमें अवस्ता, पहलवी, फ़ारसी, ईरानी, पश्तो आदि बहुत-सी प्राचीन नवीन भाषाएँ हैं।
  7. जैसा आधुनिक इतिहासज्ञ लिपिशास्त्री मानते हैं।
  8. 'चरकसंहिता', 'सुश्रुतसंहिता', 'भेडसंहिता' आदि।

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