ब्राह्मी लिपि अशोक-काल  

अशोक की ब्राह्मी लिपि

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  • सिकंदर के 325 ई.पू. में पश्चिमोत्तर भारत से ही वापस चले जाने के तुरंत बाद चंद्रगुप्त (324-300 ई.पू.) ने नंदवंश का तख्ता उलटकर मौर्य वंश की स्थापना की।
  • चंद्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिंदुसार राजगद्दी पर बैठा, और बिंदुसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अशोक 372 ई. पू. में राजा बना। ज्ञात होता है कि राजगद्दी के लिए शुरू में काफ़ी झगड़ा हुआ था; क्योंकि अशोक का राज्याभिषेक उसके गद्दी पर बैठने के चार साल बाद 268 ई. पू. में हुआ। इसके बाद उसने लगभग 37 साल तक भारत के एक विशाल भू-भाग पर राज्य किया। उसने कलिंग को भी अपने राज्य में शामिल कर लिया था। बौद्ध ग्रन्थों के उल्लेखों से पता चलता है कि आरंभ में वह, अपनी क्रूरता के कारण, चंडाशोक कहलाता था; परंतु बाद में उसने बौद्ध धर्म को स्वीकार किया और वह धार्मिक कार्य करने लगा तो उसे धर्माशोक कहा जाने लगा।
  • अशोक के केवल दो धर्मलेखो यानी गुजर्रा मध्य प्रदेश में दतिया के पास, तथा मस्की, जि0 रायचूर, कर्नाटक के लघु-शिलालेखों में ही हमें उसका 'असोक' नाम देखने में आता है। शेष सभी धर्मलेखों में उसे देवानं पियेन पियदसिन लाजिन[1] कहा गया है। स्पष्ट है कि यह नाम उसने बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद ही धारण किया होगा। अशोक का समकालीन श्रीलंका का तिस्स या तिष्य राजा भी अपने नाम के साथ 'देवनांप्रिय' जोड़ता था। तिस्स राजा के समय में ही अशोक का पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा बौद्ध धर्म का प्रचार करे के लिए श्रीलंका पहुंचे थे।
  • अशोक के लिए कहीं-कहीं 'अशोकवर्धन' नाम भी मिलता है। उसके एक धर्मलेख में उसे 'मगध का राजा' कहा गया है। परंतु उसके साम्राज्य के लिए उसके लेखों में अधिकतर 'पृथ्वी' या 'जंबूद्वीप' शब्द ही मिलते हैं। उसकी राजधानी पाटलिपुत्र, पटना में थी। अशोक के धर्मलेख भारत में जिस भी स्थान पर मिले हैं, वहां उसका राज्य निश्चित रूप से था ही। उसने अपने लेखों में 'अपराजित' राज्यों का भी स्पष्ट उल्लेख किया है। दक्षिण भारत के चोल, पांड्य, केरल तथा ताम्रपर्णी (श्रीलंका) देश अशोक के साम्राज्य के बाहर थे। उसके लेखों में एशिया के कई 'योन', यूनानी राजाओं तथा मिस्र के तुरमाय या तुलमाय (टॉलमी) राजा का भी उल्लेख मिलता है।
  • अशोक के धर्मलेख पश्चिमोत्तर भारत (पाकिस्तान) से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक मिले हैं। उसके राज्य की सीमाएं पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में अरब सागर को छूती थीं। अशोक के धर्मलेखों में केवल दो यानी शहबाजगढ़ी और मानसेहरा के शिलालेख खरोष्ठी लिपि में है। कंदहार के पास के शार-ए-कुना स्थान से अशोक का द्वैभाषिक, आरमेई-यूनानी लेख मिला है। उसके शेष सभी लेख ब्राह्मी लिपी में हैं। इन लेखों की लिपि के लिए सदैव 'धम्मलिपि', 'धम्मदिपि' या 'धम्मलिबि' शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  • अशोक के समस्त धर्मलेखों को मुख्यत: दो भागों में विभाजित किया जा सकता है:
  1. शिलास्तंभ लेख, और
  2. शिलाफलक लेख।

शिलास्तंभ एक ही प्रस्तर-खंड के हैं और ये चुनार के बलुआ पत्थरों से बनाए गए हैं। इन पर किया हुआ बहुत बढ़िया ओप (पॉलिश) आज भी हमें आश्चर्य में डाल देता हैं। इन्हें दूर-दूर तक कितनी कठिनाई से ले जाया गया होगा, इसका अंदाजा हमें फीरोजशाह द्वारा 14वीं शताब्दी में टोपरा और मेरठ से अशोक के स्तंभों के दिल्ली लाए जाने के विवरण से लग सकता है। अशोक के शिलास्तंभ आज निम्नलिखित स्थानों पर हैं:
इलाहाबाद-कोसम शिलास्तंभ

मूलत: इस स्तंभ को कौशंबी नगरी (आधुनिक कोसम- इलाहाबाद से लगभग 50 किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गांव) में स्थापित किया गया था। इस बात की कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती कि कौन इसे इलाहाबाद ले आया। इस स्तंभ पर अशोक के 6 लेख हैं। इस पर उसके दो लेख और हैं, जो 'रानी का स्तंभलेख' (क्योंकि इसमें उसकी एक रानी कालुवाकी के दान का उल्लेख है) और 'कौशांबी का स्तंभलेख' के नाम से प्रसिद्ध हैं। इसी स्तंभ पर बाद में समुद्रगुप्त (320-375 ई.) ने भी अपना एक लेख खुदवाया था। मुग़ल बादशाह जहाँगीर (1605-27 ई.) का भी एक फ़ारसी लेख इस पर मिलता है।
रुम्मिनदेई स्तंभलेख
रुम्मिनदेई, लुंबिनी के मंदिर के पास खड़ा होने से इसे यह नाम दिया गया है। यह स्थान बस्ती ज़िले के दुल्हा गांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर नेपाल की भगवानपुर तहसील में है। इसी स्थान पर भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। अशोक अपने राज्याभिषेक के 20 साल बाद इस स्थान पर पूजा करने आया था।
निगाली-सागर शिलास्तंभ
यह स्थान भी बस्ती ज़िले के उत्तर में नेपाल की तराई में है, और रुम्मिनदेई से लगभग बीस किलोमीटर पश्चिमोत्तर की तरफ है। यह स्तंभ निगलीव गांव के पास निगाली सागर नाम के एक विशाल सरोवर के पास खड़ा है। अशोक यहाँ भी पूजा के लिए आया था। गौतम बुद्ध के भी पहले के किसी कनकमुनि बुद्ध के शरीरावशेषों पर यहाँ एक स्तूप बनाया गया था।
दिल्ली-टोपरा शिलास्तंभ
इस स्तंभ को फीरोजशाह (1351-88 ई.) ने टोपरा, अंबाला ज़िला, हरियाणा से मंगवाकर दिल्ली में खड़ा करवाया था। इस पर सात लेख हैं।
दिल्ली-मेरठ शिलास्तंभ
इसे भी फीरोज मेरठ से उठाकर लाया था। फर्रुखसियर के समय (1713-19 ई.) में बारूदखाने के फटने से इस स्तंभ को बड़ा नुक़सान पहुंचा और इसके कई टुकड़े हो गए। 1876 में इसे वर्तमान रूप में खड़ा किया गया।
चंपारन ज़िले के तीन स्तंभ
बिहार के चंपारन ज़िले में अशोक के तीन स्तंभ मिलते हैं-

  1. राधिया के पास लौरिया अराराज में,
  2. मठिया के पास लौरिया नंदनगढ़ में,
  3. रमपुरवा में।

इनमें से प्रत्येक पर छह लेख हैं।
सांची स्तंभ
यह स्थान मध्य प्रदेश में भोपाल के पास है। यहाँ का स्तंभ खंडित अवस्था में है।
सारनाथ स्तंभ
सारनाथ स्तंभ वाराणसी के पास है। यहाँ से अशोक का एक भग्न स्तंभ और सुप्रसिद्ध सिंहशीर्ष मिला है।

  • अशोक के स्तंभलेख पॉलिश की हुई गोलाकार सतह पर होने के कारण अधिक स्पष्ट और कलात्मक हैं। सभी स्तंभों पर पूर्ण लेख नहीं मिलते। कुछ स्तंभों के टूट जाने के कारण उन पर खंडित लेख ही मिलते हैं, जैसे कि सारनाथ और सांची के स्तंभों पर।
  • अशोक के जो लेख शिलाओं पर मिलते हैं, उनके लिए शिलाफलक शब्द का प्रयोग हुआ है। शिलाफलकों से यहाँ अर्थ चट्टानों से है। अब तक केवल एक ही लेख ऐसा मिला है, जो अलग प्रस्तर-खंड पर उत्कीर्ण है। यह शिलाफलक राजस्थान में जयपुर के निकट बैराट से मिला था। अब यह कलकत्ता के संग्रहालय, एशियाटिक सोसायटी में रखा हुआ है, इसलिए इसे 'बैराट-कलकत्ता शिलालेख' का नाम दिया गया है। अशोक के शेष सभी शिलालेख चट्टानों पर खुदे हुए हैं। उन-उन स्थानों पर जो भी प्रमुख चट्टान मिली, उस पर लेख उत्कीर्ण कर दिए गए। लिखते समय स्तंभों की तरह चट्टानों को चिकना करने का प्रयत्न नहीं किया गया है; सामान्यत: किसी भी सपाट-से पत्थर-खंड को चुनकर उस पर लेख खुदवा दिए गए हैं। यही कारण है कि स्तंभलेखों की अपेक्षा शिलालेख कुछ बेढंगे जान पड़ते हैं। सुविधा के लिए अशोक के शिलालेखों को दो भागों में बांटा गया है-
  1. मुख्य शिलालेख या चतुर्दश-शिलालेख और
  2. लघु-शिलालेख।

लघु-शिलालेख

लघु-शिलालेख निम्न स्थानों पर पाए गए हैं:

  1. बैराट : राजस्थान के जयपुर ज़िले में। यह शिलाफलक कलकत्ता संग्रहालय में है।
  2. रूपनाथ: जबलपुर जिला, मध्य प्रदेश
  3. मस्की : रायचूर ज़िला, कर्नाटक
  4. गुजर्रा : दतिया ज़िला, मध्य प्रदेश
  5. राजुलमंडगिरि : बल्लारी ज़िला, कर्नाटक
  6. सहसराम : शाहाबाद ज़िला, बिहार
  7. गाधीमठ : रायचूर ज़िला, कर्नाटक
  8. पल्किगुंडु : गवीमट के पास, रायचूर ज़िला, कर्नाटक
  9. ब्रह्मगिरि : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
  10. सिद्धपुर : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
  11. जटिंगा रामेश्वर : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक।
  12. एर्रगुड़ी : कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश
  13. दिल्ली : अमर कॉलोनी, दिल्ली
  14. अहरौरा : मिर्जापुर ज़िला, उत्तर प्रदेश
  • ये सभी लघु-शिलालेख अशोक ने अपने राजकर्मचारियों को संबोधित करके लिखवाए हैं। अशोक ने सबसे पहले लघु-शिलालेख ही खुदवाए थे, इसलिए इनकी शैली उसके अन्य लेखों से कुछ भिन्न है।

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