ऋषभदेव मन्दिर उदयपुर  

उदयपुर से लगभग 40 किमी. दूर गाँव 'धूलेव' में स्थित भगवान ऋषभदेव का मन्दिर 'केसरियाजी' या 'केसरियानाथ' के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राचीन तीर्थ अरावली पर्वतमाला की कंदराओं के मध्य कोयल नदी के किनारे पर स्थित है। ऋषभदेव मन्दिर को जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। यह मंदिर न केवल जैन धर्मावलंबियों अपितु वैष्णव हिन्दू लोगों तथा मीणा और भील आदिवासियों एवं अन्य जातियों द्वारा भी पूजा जाता है। भगवान ऋषभदेव को तीर्थयात्रियों द्वारा अत्यधिक मात्रा में केसर चढ़ाए जाने के कारण 'केसरियाजी' कहा जाता है। यहाँ प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान 'आदिनाथ' या 'ऋषभदेव' की काले रंग की प्रतिमा स्थापित है। यहाँ के आदिवासियों के लिए ये केसरियाजी कालिया बाबा के नाम से प्रसिद्ध व पूजित हैं।[1]

निर्माण शैली

मंदिर का प्रथम द्वार नक्कारखाने के रूप में है। बाहरी परिक्रमा का चौक नक्कारखाने से प्रवेश करते ही आता है। दूसरा द्वार भी वहीं पर है। काले पत्थर का एक-एक हाथी दोनों द्वारों की ओर खड़े हुए हैं। हाथी के पास एक हवनकुंड उत्तर की तरफ़ बना है, जहाँ नवरात्रि के दिनों में दुर्गा का हवन होता है। उक्त द्वार के दोनों ओर के ताखों में से एक में ब्रह्मा की तथा दूसरे में शिव की मूर्ति है। सीढ़ियों के द्वारा इस मंदिर में जाने की व्यवस्था है। सीढ़ियों के ऊपर के मंडप में मध्यम क़द के हाथी पर बैठी हुई मरुदेवी की मूर्ति है। श्रीमद्भागवदगीता का चबूतरा सीढ़ियों से आगे बांयी तरफ़ बना है, जहाँ भागवत की कथा चौमासे में होती है। मंडप में 9 स्तम्भों के होने के कारण यह नौ-चौकी के रूप में जाना जाता है। यहाँ से तीसरे द्वार में प्रवेश किया जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जैन तीर्थ ऋषभदेव का मेला (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल.) राजस्थान के विविध रंग। अभिगमन तिथि: 7 जुलाई, 2011।

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