जैन धर्म के सिद्धांत  

जैन धर्म का प्रतीक

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

निवृत्तिमार्ग

जैन धर्म भी बौद्ध धर्म के समान निवृत्तिमार्गी था। संसार के समस्त सुख दु:ख मूलक हैं। मनुष्य आजीवन तृष्णाओं के पीछे भागता रहता है। वास्तव में यह मानव शरीर ही क्षणभंगुर है। जैन धर्म इन दु:खों से छुटकारा पाने हेतु तृष्णाओं के त्याग पर बल देता है। वह मनुष्यों को सम्पत्ति, संसार, परिवार आदि सब का त्याग करके भिक्षु बनकर इतस्तत: परिभ्रमण करने पर बल देता है। अन्य शब्दों में जैन धर्म मूलत: एक भिक्षु धर्म ही है।

ईश्वर

जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्त्व को नहीं स्वीकार करता। वह ईश्वर को सृष्टिकर्ता भी नहीं मानता। इसका कारण यह है कि ऐसा मानने से उसे संसार के पापों और कुकर्मों का भी कर्ता मानना पड़ेगा।

सृष्टि

जैन धर्म संसार को शाश्वत, नित्य, अनश्वर, और वास्तविक अस्तित्त्व वाला मानता है। पदार्थों का मूलत: विनाश नहीं होता, बल्कि उसका रूप परिवर्तित होता है।

कर्म

जैन धर्म मनुष्य को स्वयं अपना भाग्य विधाता मानता है। अपने सांसारिक एवं आध्यात्मिक जीवन में मनुष्य अपने प्रत्येक कर्म के लिए उत्तरदायी है। उसके सारे सुख-दुख कर्म के कारण ही हैं। उसके कर्म ही पुनर्जन्म का कारण हैं। मनुष्य 8 प्रकार के कर्म करता है-

  1. ज्ञानावरणीय
  2. दर्शनावरणीय
  3. वेदनीय
  4. मोहनीय
  5. आयुकर्म
  6. नामकर्म
  7. गोत्रकर्म
  8. अन्तराय कर्म

टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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