पुष्कर  

Disamb2.jpg पुष्कर एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- पुष्कर (बहुविकल्पी)


पुष्कर
पुष्कर, अजमेर
विवरण पुष्कर, ब्रह्मा के मंदिर और ऊँटों के व्यापार मेले के लिए प्रसिद्ध है।
राज्य राजस्थान
ज़िला अजमेर
भौगोलिक स्थिति उत्तर- 26° 30' 0.00", पूर्व- 74° 33' 0.00"
मार्ग स्थिति पुष्कर जंक्शन रोड से लगभग 13 से 14 किमी की दूरी पर स्थित है।
प्रसिद्धि पुष्कर के मेले में पच्चीस हज़ार से भी अधिक ऊँटों का व्यापार होता है।
कैसे पहुँचें हवाई जहाज़, रेल, बस आदि
हवाई अड्डा सांगानेर हवाई अड्डे, जयपुर
रेलवे स्टेशन अजमेर रेलवे स्टेशन
बस अड्डा अजमेर बस अड्डा
यातायात टैक्सी, ऑटो रिक्शा, साईकिल रिक्शा, स्थानीय बस
क्या देखें ब्रह्मा मन्दिर, सावित्री मन्दिर, बद्रीनारायण मन्दिर, वराह मन्दिर व शिवात्मेश्वरी मन्दिर
कहाँ ठहरें होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह
एस.टी.डी. कोड 0145
ए.टी.एम लगभग सभी
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
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भाषा हिंदी, अंग्रेजी, राजस्थानी
अन्य जानकारी पुष्कर में देश का इकलौता ब्रह्मा मन्दिर है।
अद्यतन‎

पुष्कर ब्रह्मा के मंदिर और ऊँटों के व्यापार मेले के लिए प्रसिद्ध है। पुष्कर का शाब्दिक अर्थ है तालाब। अजमेर से मात्र 11 किलोमीटर दूर तीर्थराज पुष्कर विश्वविख्यात है और पुराणों में वर्णित तीर्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। राजस्थान के शहर अजमेर में कई पर्यटन स्थल है जिनमें से ये एक है। अनेक पौराणिक कथाएं इसका प्रमाण हैं। यहाँ से प्रागैतिहासिक कालीन पाषाण निर्मित अस्त्र-शस्त्र मिले हैं, जो उस युग में यहाँ पर मानव के क्रिया-कलापों की ओर संकेत करते हैं।

ऐतिहासिक उल्लेख

बताया जाता है कि कभी इस स्थान पर मेड़ (मेर) जाति के आदिवासी निवास करते थे। उनके नाम पर इस पूरे प्रदेश का नाम मेरवाड़ा कहा जाता था। ईस्वी शताब्दी के प्रारंभ में यह क्षेत्र तक्षकों के अधिकार में रहा। इन तक्षकों को नाग भी कहा जाता था। इनका बौद्धों से वैमनस्य था। बौद्धों व हूणों के बार-बार आक्रमण के कारण ये पहाडिय़ां बदल-बदल कर आखिर वहाँ पहुंचे, जहां पुष्कर तीर्थ था। उन्होंने यहाँ से मेड़ों को मार भगाया। नाग पर्वत उनकी स्मृति का प्रतीक है। इतिहास की करवट के साथ यह आदिवासी क्षेत्र राजपूतकाल में परमार शासकों के अधीन आ गया। उस समय इस क्षेत्र को पद्मावती कहा जाने लगा। नाग व परमार दोनों ही जैन धर्मानुयायी जातियां रहीं। ब्राह्मणों से उनके संघर्ष के अनेक उदाहरण पुराणों में उपलब्ध हैं। जोधपुर के निकट मंडोर के परिहार राजपूत राजाओं व मेरवाड़ा के गुर्जर राजाओं व जागीरदारों की मदद से ब्राह्मणों ने इन जैन परमारों को सत्ताच्युत कर दिया। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के कुछ शिलालेख मिले हैं, जिनमें वर्णित प्रसंगों के आधार पर कहा जाता है कि हिंदुओं के समान ही बौद्धों के लिए भी पुष्कर पवित्र स्थान रहा है।

  • भगवान बुद्ध ने यहां ब्राह्मणों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। फलस्वरूप बौद्धों की एक नई शाखा पौष्करायिणी स्थापित हुई। शंकराचार्य, जिन सूरी और जिन वल्लभ सूरी, हिमगिरि, पुष्पक, ईशिदत्त आदि विद्वानों के नाम पुष्कर से जुड़े हुए हैं। चौहान राजा अरणोराज के काल में विशाल शास्त्रार्थ हुआ था। इसमें अजमेर के जैन विद्वान् जिन सूरी और जिन वल्लभ सूरी ने भाग लिया था। पांच सौ साल पहले निम्बार्काचार्य परशुराम देवाचार्य निकटवर्ती निम्बार्क तीर्थ से रोज यहां स्नानार्थ आते थे। वल्लभाचार्य महाप्रभु ने यहां श्रीमद्भागवत कथा की। गुरुनानक देव ने यहाँ ग्रंथ साहब का पाठ किया और सन् 1662 में गुरु गोविंद सिंह ने भी गऊघाट पर संगत की। ईसा पश्चात् 1809 में मराठा सरदारों ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। यही वह स्थान है, जहां गुरु गोविंदसिंह ने संवत 1762 (ईसा पश्चात् 1705) में गुरुग्रंथ साहब का पाठ किया।
पुष्कर, अजमेर
  • सन् 1911 ईस्वी बाद अंग्रेज़ी शासनकाल में महारानी मेरी ने यहां महिलाओं के लिए अलग से घाट बनवाया। इसी स्थान पर महात्मा गांधी की अस्थियां प्रवाहित की गईं, तब से इसे गांधी घाट भी कहा जाता है। मारवाड़ मंडोर के प्रतिहार नरेश नाहड़राव ने पुष्कर के जल से कुष्ठ रोग से मुक्ति पर पुष्कर सरोवर की खुदाई की, घाट व धर्मशाला बनवाई। हर्षनाथ मंदिर (सीकर) में मिले सन् 1037 के एक शिलालेख के अनुसार चौहान राजा सिंहराज ने हर्षनाथ मंदिर बनवाया। राणा मोकल ने वराह मंदिर में अपने को स्वर्ण से तुलवा कर ब्राह्मणों को दान में दिया। जोधपुर, जयपुर, कोटा, भरतपुर आदि रियासतों के राजाओं ने घाट बनवाए।
  • पुष्कर जैनों को भी पवित्र तीर्थ रहा है। जैनों की पट्टावलियों व वंशावलियों में यह क्षेत्र पद्मावती के नाम से विख्यात था। जिनपति सूरी ने ईसा पश्चात् 1168, 1188 व 1192 में इस स्थान की यात्रा की और अनेक लोगों को दीक्षा दी। वराह मंदिर के पास हुआ घमासान पुष्कर में पौराणिक महत्व का वराह मंदिर एक घमासान युद्ध का गवाह रहा है। यहाँ औरंगजेब और जोधपुर के महाराज अजीत सिंह के बीच हुए युद्ध में दोनों ओर के सात हज़ार सैनिक शहीद हुए थे। अजमेर के सूबेदार तहव्वुर खान को विजय मिली और उत्सव मनाने के लिए उसने एक हज़ार गायें काटने का ऐलान किया। इस पर राजपूतों ने फिर युद्ध कर तहव्वुर को भगा दिया। जीत की खुशी में गाय की प्रतिमा स्थापित की। यही प्रतिमा आज गऊ घाट पर विद्यमान है। गऊ घाट के पास शाही मस्जिद तहव्वुर ने बनवाई थी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पुष्कर माहात्म्य (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 22 अप्रैल, 2013।
  2. पुष्कर (हिन्दी) google.com/site/ajmervisit। अभिगमन तिथि: 4 जुलाई, 2011।

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