घुश्मेश्वर शिवालय  

घुश्मेश्वर शिवालय
घुश्मेश्वर शिवालय
विवरण घुश्मेश्वर शिवालय राजस्थान के (शिवाड) ग्राम में विराजमान है। यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात् यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया, अपितु स्वयं उत्पन्न है। पुरातनकाल में इस स्थान का नाम शिवालय था जो अपभ्रंश होता हुआ, शिवाल से शिवाड नाम से जाना जाने लगा।
स्थान शिवाड ग्राम, राजस्थान
भौगोलिक स्थिति 26° 11′ 54″ N, 76° 2′ 25″ E
जीर्णोद्धारक 1121 में मंडावर के राजा शिववीर चौहान ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।
Map-icon.gif गूगल मानचित्र घुश्मेश्वर शिवालय
संबंधित लेख राजस्थान, जयपुर, राजस्थान पर्यटन, महाशिवरात्रि, विक्रम संवत, शिवलिंग, महमूद ग़ज़नवी, ज्योतिर्लिंग, कच्छपावतार, समुद्र मंथन
अन्य जानकारी 1837 में ग्राम शिवाड स्थित सरोवर की खुदाई करवाने पर दो हजार शिवलिंग मिले जो इसके शिवलिंगों के आलय होने की पुष्टि करता है। मंदिर के परंपरागत पराशर ब्राह्मण पुजारियों का गोत्र भी शिवालय है।

घुश्मेश्वर शिवालय राजस्थान के शिवालय (शिवाड) ग्राम में विराजमान है। यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात् यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया, अपितु स्वयं उत्पन्न है। पुरातनकाल में इस स्थान का नाम शिवालय था जो अपभ्रंश होता हुआ, शिवाल से शिवाड नाम से जाना जाने लगा। शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग मंदिर के दक्षिण में भी तीन श्रृंगों वाला धवल पाषणों का प्राचीन पर्वत है, जिसे देवगिरी के नाम से जाना जाता है। यह महाशिवरात्रि पर एक पल के लिए सुवर्णमय हो जाता है, जिसकी पुष्टि बंजारे की कथा में होती है कि जिसने देवगिरी से मिले स्वर्ण प्रसास से ज्योतिर्लिंग की प्राचीरें एवं ऋण मुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में करवाया।

इतिहास

1837 में ग्राम शिवाड स्थित सरोवर की खुदाई करवाने पर दो हजार शिवलिंग मिले जो इसके शिवलिंगों के आलय होने की पुष्टि करता है। मंदिर के परंपरागत पराशर ब्राह्मण पुजारियों का गोत्र भी शिवालय है। कई विद्वान, धर्माचार्य, पुरातत्वविद, शोधार्थी आदि इस स्थान की यात्रा कर इसे वास्तविक घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग होने की पुष्टि कर चुके हैं। विक्रम संवत 1081 (वर्ष 1023) में महमूद ग़ज़नवी के सिपहसालार मसूद द्वारा इस स्थान का विध्वंस किया गया। इस मंदिर के प्रांगण में मिले प्रस्तर खंड, मूर्तियाँ आदि अवशेष सातवीं शताब्दी के आसपास निर्मित मंदिरों की शैली के हैं। हरा -नीलापन लिए इन बलुआ पत्थरों पर भी युगल देव मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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