कुंवर नारायण  

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कुंवर नारायण
कुंवर नारायण
पूरा नाम कुंवर नारायण
जन्म 19 सितम्बर, 1927
जन्म भूमि फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 15 नवम्बर, 2017
मृत्यु स्थान दिल्ली
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र कवि, लेखक
मुख्य रचनाएँ 'चक्रव्यूह', 'तीसरा सप्तक', 'परिवेश : हम-तुम', 'आत्मजयी', 'आकारों के आसपास', 'अपने सामने', 'वाजश्रवा के बहाने', 'कोई दूसरा नहीं' और 'इन दिनों' आदि।
भाषा हिन्दी, अंग्रेज़ी
विद्यालय लखनऊ विश्वविद्यालय
शिक्षा एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य)
पुरस्कार-उपाधि 'ज्ञानपीठ पुरस्कार', 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'व्यास सम्मान', 'कुमार आशान पुरस्कार', 'प्रेमचंद पुरस्कार', 'तुलसी पुरस्कार', 'उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार', 'राष्ट्रीय कबीर सम्मान', 'शलाका सम्मान', 'अन्तर्राष्ट्रीय प्रीमियो फ़ेरेनिया सम्मान', 'पद्मभूषण' आदि।
विशेष योगदान 'युगचेतना' और 'नया प्रतीक' तथा 'छायानट' के संपादक-मण्डल में भी कुंवर नारायण रहे हैं।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी साहित्य अकादमी द्वारा कुंवर नारायण को महत्तर सदस्यता 20 दिसंबर 2010 को नई दिल्ली में प्रदान की गयी।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

कुंवर नारायण (अंग्रेज़ी: Kunwar Narayan, जन्म- 19 सितम्बर, 1927, फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 15 नवम्बर, 2017 दिल्ली) हिन्दी के सम्मानित कवियों में गिने जाते थे। कुंवर जी की प्रतिष्ठा और आदर हिन्दी साहित्य की भयानक गुटबाजी के परे सर्वमान्य है। उनकी ख्याति सिर्फ़ एक लेखक की तरह ही नहीं, बल्कि कला की अनेक विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले रसिक विचारक के समान भी है। कुंवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। उनका रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं है। फ़िल्म समीक्षा तथा अन्य कलाओं पर भी उनके लेख नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। आपने अनेक अन्य भाषाओं के कवियों का हिन्दी में अनुवाद किया है और उनकी स्वयं की कविताओं और कहानियों के कई अनुवाद विभिन्न भारतीय और विदेशी भाषाओं में छपे हैं। 'आत्मजयी' का 1989 में इतालवी अनुवाद रोम से प्रकाशित हो चुका है। 'युगचेतना' और 'नया प्रतीक' तथा 'छायानट' के संपादक-मण्डल में भी कुंवर नारायण रहे हैं।

जीवन परिचय

19 सितम्बर, 1927 ई. को कुंवर नारायण का जन्म उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद ज़िले में हुआ था। कुंवर जी ने अपनी इंटर तक की शिक्षा विज्ञान वर्ग के अभ्यर्थी के रूप में प्राप्त की थी, किंतु साहित्य में रुचि होने के कारण वे आगे साहित्य के विद्यार्थी बन गये थे। उन्होंने 'लखनऊ विश्वविद्यालय' से 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया। 1973 से 1979 तक वे 'संगीत नाटक अकादमी' के उप-पीठाध्यक्ष भी रहे। कुंवर जी ने 1975 से 1978 तक अज्ञेय द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका में सम्पादक मंडल के सदस्य के रूप में भी कार्य किया। कुंवर नारायण की माता, चाचा और फिर बहन की असमय ही टी.बी. की बीमारी से मृत्यु हो गई थी। बीमारी से उनकी बहन बृजरानी की मात्र 19 वर्ष की अवस्था में ही मृत्यु हुई थी। इससे उन्हें बड़ा कष्ट और दु:ख पहुँचा था। कुंवर नारायण के अनुसार -

मृत्यु का यह साक्षात्कार व्यक्तिगत स्तर पर तो था ही सामूहिक स्तर पर भी था। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद सन् पचपन में मैं पौलेंड गया था। विश्वनाथ प्रताप सिंह भी गए थे मेरे साथ। वहाँ मैंने युद्ध के विध्वंस को देखा। तब मैं सत्ताइस साल का था। इसीलिए मैं अपने लेखन में जिजीविषा की तलाश करता हूँ। मनुष्य की जो जिजीविषा है, जो जीवन है, वह बहुत बड़ा यथार्थ है।[1]
लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में परास्नातक करने के बाद कुंवर नारायण ने पुश्तैनी ऑटोमोबाइल बिजनेस में काम करना शुरू कर दिया था लेकिन बाद में आचार्य जे. बी. कृपलानी, आचार्य नरेन्द्र देव और सत्यजीत रे से प्रभावित होकर उनकी रूचि साहित्य में बढ़ती गई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 अदम्य जिजीविषा का विनम्र कवि कुंवर नारायण (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 19 सितम्बर, 2012।
  2. कुंवर नारायण को मिली साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 19 सितम्बर, 2012।
  3. कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 19 सितम्बर, 2012।

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