शेरशाह सूरी साम्राज्य  

शासनकाल (1540-1555 ई.)
शेरशाह सूरी साम्राज्य की स्थापना शेरशाह सूरी ने सन् 1540 में दिल्ली की सिंहासन गद्दी पर बैठकर की। शेरशाह का वास्तविक नाम फ़रीद ख़ाँ था और उसका पिता 'हसन ख़ाँ' जौनपुर में एक छोटा ज़मींदार था। फ़रीद ने पिता की जागीर की देखभाल करते हुए काफ़ी प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया। इब्राहीम लोदी की मृत्यु और अफ़ग़ान मामलों में हलचल मच जाने पर वह एक शक्तिशाली अफ़ग़ान सरदार के रूप में उभरा। 'शेरख़ाँ' की उपाधि उसे उसके संरक्षक ने एक शेर मारने पर दी थी। जल्दी शेरख़ाँ बिहार के शासक का दाहिना हाथ बन गया। वह वास्तव में बिहार का बेताज बादशाह था। यह सब बाबर की मृत्यु से पहले घटित हुआ था। इस प्रकार शेरख़ाँ ने अचानक ही महत्त्व प्राप्त कर लिया था।

राजस्थान के संघर्ष

शासक के रूप में शेरशाह ने मुहम्मद बिन तुग़लक़ के समय के बाद स्थापित सशक्ततम साम्राज्य पर राज्य किया। उसका राज्य सिंधु नदी से कश्मीर सहित बंगाल तक फैला हुआ था। पश्चिम में उसने मालवा और लगभग सारा राजस्थान जीता। उस समय मालवा कमज़ोर और बिखरा हुआ था। अतः विरोध कर पाने की स्थिति में नहीं था। लेकिन राजस्थान में स्थिति भिन्न थी। मालदेव ने, जो 1532 में गद्दी पर बैठा था, सारे पश्चिम और उत्तर-राजस्थान को अपने अधिकार में कर लिया था। शेरशाह और हुमायूँ के बीच संघर्ष के समय उसने अपनी सीमाओं का और भी विस्तार कर लिया था। जैसलमेर के भट्टियों की मदद से उसने अजमेर को भी जीत लिया। इन विजयों के दौर में मेवाड़ सहित इस क्षेत्र के शासकों से उसका संघर्ष हुआ। उसका अन्तिम कार्य बीकानेर की विजय था। लड़ाई में बीकानेर का शासक वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारा गया। उसके लड़के कल्याण दास और भीम शेरशाह की शरण में पहुँचे। इनमें मालदेव के संबंधी मेड़ता के बीरम देव भी थे। जिन्हें उसने जागीर से बेदख़ल कर दिया था।

इस प्रकार वही स्थिति उत्पन्न हो गई, जो बाबर और राणा साँगा के समक्ष थी। मालदेव द्वारा राजस्थान में एक केन्द्रीय शासन की स्थापना के प्रयत्न को दिल्ली और आगरा के सुल्तान एक ख़तरा मानते, ऐसा अवश्याम्भावी था। ऐसा विश्वास था कि मालदेव के पास 50,000 सिपाही थे, लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मालदेव की नज़र दिल्ली या आगरा पर थी। पूर्व संघर्षों की भाँति इस बार भी दोनों पक्षों के बीच संघर्ष का कारण सैनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र राजस्थान पर आधिपत्य था।

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