जागीरदार प्रथा  

जागीरदार प्रथा भारत में मुस्लिम शासन काल में विकसित (13वीं शताब्दी के प्रारम्भ में) हुई थी। यह भूमि की रैयतदारी प्रणाली थी, जिसमें किसी भूमि से लगान प्राप्त करने और उसके प्रशासन की ज़िम्मेदारी राज्य के एक अधिकारी को दी जाती थी। किसी जागीरदार को जागीर सौंपा जाना सशर्त या बिना शर्त भी हो सकता था।

जागीर प्रथा

दिल्ली के प्रारम्भिक सुल्तानों ने शुरू की। इस प्रथा के अंतर्गत सरदारों को नकद वेतन न देकर जागीरें प्रदान कर दी जाती थीं। उन्हें इन जागीरों का प्रबंध करने तथा मालगुजारी वसूल करने का हक दे दिया जाता था। यह सामंतशाही शासन प्रणाली थी और इससे केंद्रीय सरकार कमज़ोर हो जाती थी। इसलिए सुल्तान ग़यासुद्दीन बलवन ने इस पर रोक लगा दी और सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने इसे समाप्त कर दिया। परंतु सुल्तान फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने इसे फिर से शुरू कर दिया और बाद के काल में भी यह चलती रही। शेरशाह सूरी और अकबर दोनों इस प्रथा के विरोधी थे। वे इसको समाप्त कर उसके स्थान पर सरदारों को नकद वेतन देने की प्रथा शुरू करना चाहते थे परंतु बाद के मुग़ल बादशाहों ने यह प्रथा फिर शुरू कर दी। उनको कमज़ोर बनाने और उनके पतन में इस प्रथा का भी हाथ रहा है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पुस्तक- भारतीय इतिहास कोश |लेखक- सच्चिदानन्द भट्टाचार्य | पृष्ट संख्या- 167 | प्रकाशन- उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ

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