दुर्गादास  

दुर्गादास के सम्मान में जारी डाक टिकट

दुर्गादास मारवाड़ का प्रसिद्ध राठौर सरदार था। वह जोधपुर के राजा जसवंत सिंह के मंत्री असिकर्ण का पुत्र था। मुग़ल सम्राट की ओर से जब राजा जसवंत सिंह क़ाबुल अभियान पर गया था, उसी बीच वहाँ 10 दिसम्बर 1678 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। उस समय उसका कोई भी पुत्र नहीं था। लेकिन दो माह के पश्चात् उसकी विधवा रानियों के दो पुत्र हुए। एक पुत्र तो तत्काल ही मर गया, लेकिन दूसरा अजीत सिंह के नाम से विख्यात हुआ। यही अजीत सिंह मारवाड़ का वैध उत्तराधिकारी था। स्वर्गीय राजा के सरदारों के संरक्षण में शिशु अजीतसिंह तथा उसकी माँ को दिल्ली लाया गया। इन सरदारों में दुर्गादास प्रमुख था।

आरम्भिक जीवन

सन् 1605 ई., में असिकर्ण जी ('आशकरण' भी प्रचलित) उज्जैन की लड़ाई में धोखे से मारे गये। उस समय दुर्गादास केवल पंद्रह वर्ष के थे पर ऐसे होनहार थे, कि जसवन्तसिंह अपने बड़े बेटे पृथ्वीसिंह की तरह इन्हें भी प्यार करने लगे। कुछ दिनों बाद जब महाराज दक्खिन की सूबेदारी पर गये, तो पृथ्वीसिंह को राज्य का भार सौंपा और वीर दुर्गादास को सेनापति बनाकर अपने साथ कर लिया। उस समय दक्खिन में महाराज शिवाजी का साम्राज्य था। मुग़लों की उनके सामने एक न चलती थी; इसलिए औरंगजेब ने जसवन्तसिंह को भेजा था।जसवन्तसिंह के पहुंचते ही मार-काट बन्द हो गई। धीरे-धीरे शिवाजी और जसवन्तसिंह में मेल-जोल हो गया। औरंगजेब की इच्छा तो थी कि शिवाजी को परास्त किया जाये। यह इरादा पूरा न हुआ, तो उसने जसवन्तसिंह को वहां से हटा दिया, और कुछ दिनों उन्हें लाहौर में रखकर फिर काबुल भेज दिया। काबुल के मुसलमान इतनी आसानी से दबने वाले नहीं थे। भीषण संग्राम हुआ; जिसमें महाराजा के दो लड़के मारे गये। बुढ़ापे में जसवन्तसिंह को यही गहरी चोट लगी। बहुत दु:खी होकर वहां से पेशावर चले गये।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. दुर्गादास (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल,) हिन्दी समय डॉट कॉम। अभिगमन तिथि: 19 अप्रॅल, 2011।

(पुस्तक 'भारतीय इतिहास कोश') पृष्ठ संख्या-207

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