ब्रज में होली  

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ब्रज में होली
बल्देव की होली, मथुरा
विवरण ब्रज की होली की परंपरा का उल्लेख अंग्रेज़ी कलक्टर एफ़. एस. ग्राउस ने अपनी पुस्तक 'डिस्ट्रिक मेमोयर' में भी किया है। उस दौरान होलिका के रूप में गोबर के थपे कंडे (उपले, गूलरी की माला) आदि रखी जाती थी।
राज्य उत्तर प्रदेश
क्षेत्र ब्रज ( मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, गोकुल, बल्देव, बरसाना)
संबंधित लेख होली, होलिका दहन, होलिका, प्रह्लाद
अन्य जानकारी ब्रजमंडल के होलिकोत्सव में हुड़दंग, रसिक परंपराओं का निर्वाह, हास्य-व्यंग्य, अबीर और गुलाल के साथ संगीत, कला, काव्य आदि के रंगबिरंगे प्रयास किए जाते हैं।

ब्रज में होली की पहचान निराली है। कहीं लठामार होली होती है तो कहीं आग में पंडा निकल कर भक्त प्रह्लाद की भक्ति के दर्शन कराता है, कहीं हुरंगा होते हैं। ब्रज की होली की परंपरा का उल्लेख अंग्रेज़ी कलक्टर एफ़. एस. ग्राउस ने अपनी पुस्तक 'डिस्ट्रिक मेमोयर' में भी किया है। उस दौरान होलिका के रूप में गोबर के थपे कंडे (उपले, गूलरी की माला) आदि रखी जाती थी। इस परंपरा ने सत्तर के दशक में स्वरूप परिवर्तित कर लिया। इसी दशक में होलिका का प्रतिमा दहन शुरू हुआ। इस परंपरा के गवाह और नागरिक मंडल लाला गंज के संस्थापक अध्यक्ष के अनुसार शहर में सर्वप्रथम होलिका प्रतिमा दहन 1971 में होली वाली गली में शुरू हुआ। 26 जनवरी 1976, गणतंत्र दिवस की 26वीं वर्षगांठ पर ब्रज में नागरिक मंडल का गठन हुआ था। ब्रजमंडल के होलिकोत्सव में हुड़दंग, रसिक परंपराओं का निर्वाह, हास्य-व्यंग्य, अबीर और गुलाल के साथ संगीत, कला, काव्य आदि के रंगबिरंगे प्रयास किए जाते हैं। आयोजन में ब्रज की लोक कलाएं, रसिया, स्वांग, नौटंकी आदि के साथ ही धमार, होरी गायन से ब्रज की संस्कृति की झलक दिखायी जाती है।[1]

लोक मान्यताएँ

जेठ और भाभी की होली

मांट के गांव जाबरा में जेठ और भाभी की होली होती है। यहां राधाजी अपने जेठ बलराम संग होती खेलती हैं। यहां होली का अद्भुत रंग देखने को मिलता है। फाल्गुन के उल्लास और श्रीकृष्ण के अग्रज ब्रज के ठाकुर बलराम ने जेठ होकर राधा से भाभी और देवर के समान होली खेलने की अभिलाषा व्यक्त की। राधा यह बात सुन कर विचलित हुईं और कृष्ण से कहा तो वे मुस्कराकर बोले कि त्रेता युग में बलराम लक्ष्मण थे, आप सीता के साथ रूप में उनकी भाभी थीं। उसी नाते से भाभी कह दिया होगा। जाबरा मांट तहसील हेडक्वार्टर में मात्र चार किलोमीटर दूर गोरई रोड पर बसा प्रचीन गांव है। प्रसिद्ध भजन गायक स्वामी शिवराम जी का जन्म भी इसी गांव में हुआ था। गांव में फाल्गुन माह की प्रथम तिथि को सुबह कजरा होता है। इसमें ब्रजवासियों के साथ हुरियारे गाते-बजाते गाँव की परिक्रमा करते हैं। इसमें गांव के वयोवृद्ध लोगों का दल कजरा के पीछे-पीछे ब्रजभाषा के प्राचीन होली के लोक गीतों को ऊंचे स्वरों में गाते हुए चलते हैं। हुरंगा से पूर्व गांव में छोटे-छोटे पहलवानों का दंगल होता है। शाम को गांव के बाहर मैदान में ब्रज के होली रसियों के गायन के साथ सेठ और भाभी के बीच विशाल हुरंगे का आयोजन होता है। उसके बाद गांव की परिक्रमा की जाती है। दूज को जाबरा के गांव चंद्रवन में मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें आने वाले सैकड़ों गांवों के लोग अपने-अपने गांव का नगाड़ा लेकर आते हैं। यहां रसियों और नगाड़ों की तान पर लोग जमकर नृत्य करते हैं। जाबरा भन्नी पर विशाल कुश्ती दंगल का आयोजन भी किया जाता है। इसमें हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली से प्रसिद्ध पहलवान कुश्ती लड़ने को आते हैं। लगातार तीन साल कुश्ती जीतने वाले पहलवान को पांच किलोग्राम का गदा इनाम के रूप में दिया जाता है।[2]

श्यामा-श्याम के फाग से आज भी लाल है गुलाल कुंड

गांठोली का गुलाल कुंड श्यामा-श्याम (राधा-कृष्ण) के फाग से आज भी लालमलाल है। फागुन मास में आज भी कुंड का जल गुलाबी नज़र आता है। गुजरात, महाराष्ट्र आदि स्थानों से आने वाले वैष्णव जन कुंड पर होली खेलकर प्रिया प्रीतम के रंग में तर होते हैं। गोवर्धन से तीन किमी दूर स्थिर गांठोली गांव का नामकरण होली-लीला से जुड़ा है। यहां होली खेलने क दौरान राधा माधव सिंहासन पर विराजमान थे। तब कुछ सखियों ने उनके वस्त्रों में गांठ लगा दी। इस लीला से ही गांव का नाम गांठोली पड़ा। इस स्थल पर श्यामा-श्याम ने सखियों के साथ होली खेली थी। महारास के बाद रचे गए फाग में त्रिभुवन सराबोर हो नृत्य करने लगा था। आज हरि खेलत फाग घनी, इत गोरी रोरी भरि झोरी उत गोकुल कौ धनी...। कहा जाता है कि होली खेलने के बाद युगल सरकार व गोपियों ने इस कुंड में अपने अंग वस्त्र धोए थे। इससे कुंड का जल गुलाबी हो गया था। इसलिए यह गुलाल कुंड कहलाता। भक्ति रत्नाकर ग्रंथ में लिखा है कि वसंत के समय में लोगों को गुलाल कुंड के जल का रंग गुलाबी नज़र आता है। कुंड के पास बल्लभाचार्य जी की बैठक है। यहां आने वाले वैष्णव कुंड में गुलाल अर्पित कर एक दूसरे से होली खेलते हैं।[3]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015
  2. आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015
  3. आभार- अमर उजाला, 5 मार्च, 2015

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