गोविन्द देव मन्दिर वृन्दावन  

गोविन्द देव मन्दिर वृन्दावन
गोविन्द देव जी का मंदिर
विवरण मथुरा ज़िले के वृन्दावन नगर में स्थित एक वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है।
राज्य उत्तर प्रदेश
नगर वृन्दावन
निर्माता राजा मानसिंह
निर्माण सन 1590 ई. अथवा संवत 1647
वास्तु शैली हिन्दू (उत्तर-दक्षिण भारत), जयपुरी, मुग़ल, यूनानी और गोथिक[1] का मिश्रण।
पुन: स्थापना सन 1873 ई.
प्रसिद्धि उत्तरी भारत की स्थापत्य कला का उत्‍कृष्टतम् नमूना
संबंधित लेख गोपीनाथ मन्दिर, जुगल किशोर मन्दिर और मदन मोहन मन्दिर
माप 105 x 117 फुट (200 x 120 फुट बाहर से), ऊँचाई- 110 फुट (सात मंज़िल थीं आज केवल चार ही मौजूद हैं)
अन्य जानकारी मंदिर के निर्माण में 5 से 10 वर्ष लगे और लगभग एक करोड़ रुपया ख़र्चा बताया गया है।
बाहरी कड़ियाँ गूगल मानचित्र
अद्यतन‎

गोविन्द देव मन्दिर उत्तर प्रदेश राज्य के वृन्दावन नगर में स्थित वैष्णव संप्रदाय का मंदिर है, जिसका निर्माण काल- ई. 1590 अथवा संवत 1647, शासन काल - अकबर (मुग़ल), निर्माता- राजा मानसिंह पुत्र राजा भगवान दास, आमेर (जयपुर, राजस्थान) है। इस मन्दिर की शिल्प रूपरेखा का निरीक्षण रूप गोस्वामी और सनातन गुरु, कल्यानदास (अध्यक्ष), माणिक चन्द्र चोपड़ा (शिल्पी), गोविन्द दास और गोरख दास (कारीगर) के निर्देशन में हुआ।

निर्माण

गोविन्द देव जी का मंदिर ई. 1590 (सं.1647) में बना। मंदिर के शिलालेख[2] से यह जानकारी पूरी तरह सुनिश्चित हो जाती है कि इस भव्य देवालय को आमेर (जयपुर, राजस्थान) के राजा भगवान दास के पुत्र राजा मानसिंह ने बनवाया था। रूप एवं सनातन नाम के दो गुरुओं की देखरेख में मंदिर के निर्माण होने का उल्लेख भी मिलता है। जेम्स फर्गूसन ने लिखा है कि यह मन्दिर भारत के मन्दिरों में बड़ा शानदार है। मंदिर की भव्यता का अनुमान इस उद्धरण से लगाया जा सकता है। 'औरंगज़ेब ने शाम को टहलते हुए, दक्षिण-पूर्व में दूर से दिखने वाली रौशनी के बारे जब पूछा तो पता चला कि यह चमक वृन्दावन के वैभवशाली मंदिरों की है। औरंगज़ेब, मंदिर की चमक से परेशान था, समाधान के लिए उसने तुरंत कार्यवाही के रूप में सेना भेजी। मंदिर, जितना तोड़ा जा सकता था उतना तोड़ा गया और शेष पर मस्जिद की दीवार, गुम्मद आदि बनवा दिए। कहते हैं औरंगज़ेब ने यहाँ नमाज़ में हिस्सा लिया।' मंदिर के निर्माण में 5 से 10 वर्ष लगे और लगभग एक करोड़ रुपया ख़र्चा बताया गया है। सम्राट अकबर ने निर्माण के लिए लाल पत्थर दिया। श्री ग्राउस के विचार से, अकबरी दरबार के ईसाई पादरियों ने, जो यूरोप के देशों से आये थे, इस निर्माण में स्पष्ट भूमिका निभाई जिससे यूनानी क्रूस और यूरोपीय चर्च की झलक दिखती है।

डॉ. प्रभुदयाल मीतल ने श्री उदयशंकर शास्त्री के हवाले से बताया है कि ग्राउस का कथन सही नहीं है। 'प्रासाद मंडन में कहा है- प्रासाद (गर्भगृह) के आगे बूढ़ मंडप, उसके आगे छ: चौकी, छ: चौकी के आगे रंग मंडप, रंग मंडप के आगे तोरणयुक्त मंडप बनना चाहिए। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके मंडप में ही है। इसके खंड आपस में इस सुघड़ता के साथ गुंथे हुए हैं कि उनसे मंदिर के मुख्य जगमोहन की शोभा द्विगुणित हो जाती है। इसका व्यास 40 फुट है और लम्बाई चौड़ाई नियमानुसार है। इसकी छत चार कमानी दार आरों (शहतीर नुमा पत्थरों) से बनाई गयी है।...'

ई.1873 में श्री ग्राउस (तत्कालीन ज़िलाधीश मथुरा) ने मंदिर की मरम्मत का कार्य शुरू करवाया, जिसमें 38,365 रुपये का ख़र्च आया। जिसमें 5000 रुपये महाराजा जयपुर ने दिया और शेष सरकार ने। मरम्मत और रख रखाव आज भी जारी है लेकिन मंदिर की शोचनीय दशा को देखते हुए यह सब कुछ नगण्य है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. गोथिक शैली से अभिप्राय तिकोने मेहराबों वाली यूरोपीय शैली से है जिससे इमारत के विशाल होने का आभास होता है
  2. संवत् 34 श्री शकवंध अकबर शाह राज श्री कर्मकुल श्री पृथिराजाधिराज वंश महाराज श्रीभगवंतदाससुत श्री महाराजाधिराज श्रीमानसिंहदेव श्री बृंदाबन जोग पीठस्थान मंदिर कराजै ।
    श्री गोविन्ददेव को कामउपरि श्रीकल्याणदास आज्ञाकारी माणिकचंद चोपाङ शिल्पकारि गोविन्ददास दील- वलि कारिगरु: द:। गोरषदसुवींभवलृ ।।

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