राधाकुण्ड गोवर्धन  

राधाकुण्ड गोवर्धन
राधाकुण्ड गोवर्धन
विवरण 'राधाकुण्ड' प्रसिद्ध हिन्दू धार्मिक स्थल गोवर्धन, मथुरा में स्थित है। यह श्रीराधा-कृष्ण की लीला-विलास का स्थल है। यहाँ श्रीराधा-कृष्ण की स्वच्छन्दतापूर्वक नाना प्रकार की केलि–क्रीड़ाएँ सम्पन्न होती हैं।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला मथुरा
मार्ग स्थिति श्रीराधाकुण्ड गोवर्धन से प्राय: 3 मील उत्तर–पूर्व कोण में स्थित है और वृन्दावन तथा मथुरा दोनों से यह लगभग 14 मील की दूरी पर अवस्थित है।
प्रसिद्धि हिन्दू धार्मिक स्थल
कब जाएँ राधाष्टमी, कार्तिक कृष्णाष्टमी, दीपावली
बस अड्डा गोवर्धन बस अड्डा
यातायात बस, कार, ऑटो आदि
कहाँ ठहरें होटल तथा धर्मशालाएँ आदि।
क्या ख़रीदें ठाकुर जी के श्रृंगार सामग्री व प्रतिमाएँ
एस.टी.डी. कोड 0565
संबंधित लेख मथुरा, गोवर्धन, कृष्ण, ललिता सखी, राधा, विशाखा सखी, वृन्दावन, चैतन्य महाप्रभु, रघुनाथदास गोस्वामी, श्रीरूप गोस्वामी आदि।
अन्य जानकारी श्रीराधाकुण्ड गोवर्धन पर्वत की तलहटी में शोभायमान है, कार्तिक माह की कृष्णाष्टमी के दिन यहाँ स्नान करने वाले श्रद्धालुओं को श्रीराधा–कुञ्जबिहारी श्रीहरि की सेवामयी प्रेमाभक्ति प्राप्त होती है।
पद्म पुराण में कहा गया है कि जिस प्रकार समस्त गोपियों में राधाजी श्रीकृष्ण को सर्वाधिक प्रिय हैं, उनकी सर्वाधिक प्राणवल्लभा हैं, उसी प्रकार राधाजी का प्रियकुण्ड भी उन्हें अत्यन्त प्रिय है।[1]और भी वराह पुराण में है कि[2]हे श्रीराधाकुण्ड! हे श्रीकृष्णकुण्ड! आप दोनों समस्त पापों को क्षय करने वाले तथा अपने प्रेमरूप कैवल्य को देने वाले हैं। आपको पुन:-पुन: नमस्कार है इन दोनों कुण्डों का माहत्म्य विभिन्न पुराणों में प्रचुर रूप से उल्लिखित है। श्री रघुनाथदास गोस्वामी यहाँ तक कहते हैं कि ब्रजमंडल की अन्यान्य लीलास्थलियों की तो बात ही क्या, श्री वृन्दावन जो रसमयी रासस्थली के कारण परम सुरम्य है तथा श्रीमान गोवर्धन भी जो रसमयी रास और युगल की रहस्यमयी केलि–क्रीड़ा के स्थल हैं, ये दोनों भी श्रीमुकुन्द के प्राणों से भी अधिक प्रिय श्रीराधाकुण्ड की महिमा के अंश के अंश लेश मात्र भी बराबरी नहीं कर सकते। ऐसे श्रीराधाकुण्ड में मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ।[3]

श्रीराधाकुण्ड गोवर्धन से प्राय: 3 मील उत्तर–पूर्व कोण में स्थित है। गाँव का नाम आरिट है। यहीं अरिष्टासुर का वध हुआ था। कंस का यह अनुचर बैल या साँड का रूप धारण कर कृष्ण को मारना चाहता था, किन्तु कृष्ण ने यहीं पर इसका वध कर दिया था। वृन्दावन और मथुरा दोनों से यह 14 मील की दूरी पर अवस्थित है। श्रीराधाकुण्ड श्रीराधाकृष्ण युगल के मध्याह्रक–लीलाविलासका स्थल है। यहाँ श्रीराधाकृष्ण की स्वच्छन्दतापूर्वक नाना प्रकार की केलि–क्रीड़ाएँ सम्पन्न होती हैं। जो अन्यत्र कहीं भी सम्भव नहीं है। इसलिए इसे नन्दगाँव, बरसाना, वृन्दावन और गोवर्धन से भी श्रेष्ठ भजन का स्थल माना गया है। इसलिए श्रीराधाभाव एवं कान्ति सुवलित श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं इस परमोच्च भावयुक्त रहस्यमय स्थल का प्रकाश किया है। उनसे पूर्व श्रीमाधवेन्द्रपुरी , श्रीलोकनाथ गोस्वामी, श्रीभूगर्भ गोस्वामी श्री ब्रज में आये और कृष्ण की विभिन्न लीलास्थलियों का प्रकाश किया, किन्तु उन्होंने भी इस परमोच्च रहस्यमयी स्थली का प्रकाश नहीं किया। स्वयं श्रीराधाकृष्ण मिलिततनु श्रीगौरसुन्दर ने ही इसका प्रकाश किया।

कथा-प्रसंग

श्री कृष्ण ने जिस दिन अरिष्टासुर का वध किया, उसी दिन रात्रिकाल में इसी स्थल पर श्रीकृष्ण के साथ श्री राधिका आदि प्रियाओं का मिलन हुआ। श्रीकृष्ण ने बड़े आतुर होकर राधिका का आलिंगन करने के लिए अपने कर पल्लवों को बढ़ाया, उस समय राधिका परिहास करती हुई पीछे हट गयी और बोलीं– आज तुमने एक वृष (गोवंश) की हत्या की है। इसलिए तुम्हें गो हत्या का पाप लगा है, अत: मरे पवित्र अंगों का स्पर्श मत करो। किन्तु कृष्ण ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। –प्रियतमे! मैंने एक असुर का वध किया है। उसने छलकर साँड का वेश बना लिया था। अत: मुझे पाप कैसे स्पर्श कर सकता है? राधिका ने कहा- जैसा भी हो तुमने साँड के रूप में ही उसे मारा हैं। अत: गो हत्या का पाप अवश्य ही तुम्हें स्पर्श कर रहा है। सखियों ने भी इसका अनुमोदन किया। प्रायश्चित्त का उपाय पूछने पर राधिकाजी ने मुस्कराते हुए भूमण्डल के समस्त तीर्थों में स्नान को ही प्रायश्चित्त बतलाया। ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण ने अपनी एड़ी की चोट से एक विशाल कुण्ड का निर्माण कर उसमें भूमण्डल के सारे तीर्थों को आह्वान किया। साथ ही साथ असंख्य तीर्थ रूप धारण कर वहाँ उपस्थित हुए। कृष्ण ने उन्हें जलरूप से उस कुण्ड में प्रवेश करने को कहा। कुण्ड तत्क्षणात परम पवित्र एवं निर्मल जल से परिपूर्ण हो गया। श्रीकृष्ण उस कुण्ड में स्नान कर राधिकाजी को पुन: स्पर्श करने के लिए अग्रसर हुए: किन्तु राधिका स्वयं उससे भी सुन्दर जलपूर्ण वृहद कुण्ड को प्रकाश कर प्रियतम के आस्फालन का उत्तर देना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने तुनक-कर पास में ही सखियों के साथ अपने कंकण के द्वारा एक परम मनोहर कुण्ड का निर्माण किया। किन्तु उसमें एक बूँद भी जल नहीं निकला। कृष्ण ने परिहास करते हुए गोपी|गोपियों को अपने कुण्ड से जल लेने के लिए कहा, किन्तु राधिकाजी अपनी अगणित सखियों के साथ घड़े लेकर मानसी गंगा से पानी भर लाने के लिए प्रस्तुत हुई, किन्तु श्रीकृष्ण ने तीर्थों को मार्ग में सत्याग्रह करने के लिए इंगित किया। तीर्थों ने रूप धारणकर सखियों सहित राधिकाजी की बहुत सी स्तुतियाँ कीं, राधिकाजी ने प्रसन्न होकर अपने कुण्ड में उन्हें प्रवेश करने की अनुमति दी। साथ ही साथ तीर्थों के जल प्रवाह ने कृष्णकुण्ड से राधाकुण्ड को भी परिपूर्ण कर दिया। श्रीकृष्ण ने राधिका एवं सखियों के साथ इस प्रिय कुण्ड में उल्लासपूर्वक स्नान एवं जल विहार किया। अर्धरात्रि के समय दोनों कुण्डों का प्रकाश हुआ था। उस दिन कार्तिक माह की कृष्णाष्टमी थी, अत: उस बहुलाष्टमी की अर्द्धरात्रि में लाखों लोग यहाँ स्नान करते हैं।


श्रीराधाकुण्ड गोवर्धन पर्वत की तलहटी में शोभायमान है, कार्तिक माह की कृष्णाष्टमी (इन दोनों कुण्ड की प्रकट तिथि बहुलाष्टमी) के दिन यहाँ स्नान करने वालों श्रद्धालुओं को श्रीराधा–कुञ्जविहारी श्रीहरि की सेवामयी प्रेमाभक्ति प्राप्त होती है।[4] कार्तिक माह की दीपावली के दिन श्रीराधाकुण्ड में श्रीराधाकृष्ण के ऐकान्तिक भक्तों को अखिलब्रह्माण्ड तथा सम्पूर्ण ब्रजमण्डल दीख पड़ता है ।[5]

राधाकुण्ड, गोवर्धन

कुण्डों का उद्धार

कुछ समय बाद श्रीकृष्ण के द्वारका गमन के प्रश्चात ये दोनों कुण्ड लुप्त हो गये थे। महाराज वज्रनाभ ने (कृष्ण के प्रपौत) शाण्डिल्य आदि ऋषियों के अनुगत्य में ब्रज की लीलास्थलियों को प्रकाश करते समय इन दोनों कुण्डों का भी पुन: उद्धार किया, किन्तु पाँच हज़ार वर्षों के पश्चात् ये दोनों कुण्ड पुन: लुप्त हो गये। जिस समय श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ पधारे, उस समय यहाँ के लोगों से राधाकुण्ड एवं श्याम कुण्ड के विषय में पूछा, किन्तु वे लोग इसके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं बता सके। केवल इतना ही बताया कि सामने कालीखेत एवं गौरीखेत हैं, जहाँ कुछ-कुछ जल है। महाप्रभु ने बड़े आदर के साथ कालीखेत को श्यामकुण्ड और गौरीखेत को राधाकुण्ड सम्बोधन कर प्रणाम किया। उनमें स्नान करते ही वे भाव-विभोर हो उठे, उनका सारा धैर्य जाता रहा, वे हा राधे! वे हा राधे! हा कृष्ण! कहते हुए मूर्छित हो गये। जिस स्थान पर वे बैठे थे वह आज भी तमालतला के नाम से प्रसिद्ध है। उसे महाप्रभु जी की वैठक भी कहा जाता है।


श्रीचैतन्य महाप्रभु के अप्रकट होने के प्रश्चात रघुनाथदास गोस्वामी जगन्नाथ पुरी से राधाकुण्ड में आकर भजन करने लगे, एक समय मुग़ल सम्राट अकबर, अपनी बड़ी सेना के साथ इसी रास्ते से कहीं जा रहा था, सारी सेना, उसके हाथी, घोड़े, ऊँट सभी बहुत प्यासे थे। उसने दास गोस्वामीजी से पूछा– कहीं बड़ा सरोवर उपलब्ध हो सकता है? उन्होंने कालीखेत एवं गौरीखेत में पानी पीने एवं पिलाने के लिए इंगित किया। बादशाह ने सोचा यह पानी उसके एक हाथी के लिए भी पर्याप्त नहीं है, इसमें सभी की प्यास कैसे बुझ सकती है? किन्तु दास गोस्वामी के पुन:–पुन: कहने से उसने देखा कि सारी सेनाएँ, घोड़े, हाथी और ऊँट उस जल से तृप्त हो गये, जल तनिक भी कम नहीं हुआ। बादशाह के आश्चर्य की सीमा नहीं रही।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यथा राधा प्रिया विष्णों: तस्या: कुण्डं प्रियं तथा। सर्वगोपीषु सेवैका विष्णोंरत्यन्तवल्लभा।।(पद्म पुराण
  2. सर्वपापहरस्तीर्थ नमस्ते हरिमुक्तिद:। नम: कैवल्यनाथाय राधाकृष्णभिधायिने।। (वराह पुराण
  3. श्री वृन्दाविपिनं सुरम्यमपि तच्छ्रीमान् स गोवर्द्धन: सा रासस्थलिकाप्यलं रसमयी किं तावदन्यत् स्थलम्। यस्याप्यंशलवेन नार्हति मनाक् साम्यं व मुकुन्दस्य तत्। प्राणेभ्योऽप्यधिकप्रियेव दयितं तत्कुण्डमेवाश्रये।। श्रीरघुनाथदास गोस्वामी
  4. गोवर्धनगिरौ रम्ये राधाकुण्डं प्रियं हरे:। कार्तिके बहुलाष्टम्यां तत्र स्नात्वा हरे: प्रिय: ।। नरो भक्तो भवेद्धितत्स्थितस्य तस्य प्रतोषणाम् ।। (पद्म पुराण
  5. दीपोत्सवे कार्तिके च राधाकुण्डे युधिष्ठिर। दृश्यते सकलं विश्वं भृत्यैर्विष्णुपरायणै:।।(पद्म पुराण
  6. हे वृन्दावनेश्वरि! मैं तुम्हारी पुन:-पुन: वन्दना करता हूँ, तुम नित्य नवीन गोरोचना की भाँति गौराग्ङी हो, सुन्दर नीलकमल जैसे तुम्हारे वस्त्र हैं, तुम्हारे मस्तक से नीचे की ओर लम्बित वेणी के ऊपर मणिरत्नों ग्रथित कवरीबन्ध को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह फणायुक्त काली भुजग्ङिनी हो।

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