नन्दगाँव  

नन्दगाँव
नन्द जी मंदिर, नन्दगांव
विवरण 'नन्दगाँव' में ब्रजराज श्रीनन्दमहाराज जी का राजभवन है। यहाँ श्रीनन्दराय, उपानन्द, अभिनन्द, सुनन्द तथा नन्द ने वास किया था, इसलिए यह नन्दगाँव सुखद स्थान है।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला मथुरा
मार्ग स्थिति मथुरा से 30 कि.मी. की दूरी पर स्थित।
प्रसिद्धि 'लट्ठमार होली'
कब जाएँ कभी भी
रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन
यातायात बस, कार, ऑटो आदि
क्या देखें बरसाना, लट्ठमार होली, नन्द जी मंदिर, नंदकुण्ड, पानीहारी कुण्ड आदि।
संबंधित लेख नंद, यशोदा, श्रीकृष्ण, बलराम, ब्रज, मथुरा
अन्य जानकारी बरसाना और नंदगाँव की 'लट्ठमार होली' तो जगप्रसिद्ध है। "नंदगाँव के कुँवर कन्हैया, बरसाने की गोरी रे रसिया" और ‘बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ गीतों के साथ ही ब्रज की होली की मस्ती शुरू होती है।
अद्यतन‎

नन्दगाँव ब्रजमंडल का प्रसिद्ध तीर्थ है। मथुरा से यह स्थान 30 किलोमीटर दूर है। नंद यहीं पर रहते थे। यहाँ एक पहाड़ी पर नन्द बाबा का मन्दिर है। नीचे पामरीकुण्ड नामक सरोवर है। यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशाला हैं। भगवान कृष्ण के पालक पिता से सम्बद्ध होने के कारण यह स्थान तीर्थ बन गया है। नन्दगाँव में ब्रजराज श्रीनन्दमहाराज जी का राजभवन है। यहाँ श्रीनन्दराय, उपानन्द, अभिनन्द, सुनन्द तथा नन्द ने वास किया है, इसलिए यह नन्दगाँव सुखद स्थान है। [1]


गोवर्धन से 16 मील पश्चिम उत्तर कोण में, कोसी से 8 मील दक्षिण में तथा वृन्दावन से 28 मील पश्चिम में नन्दगाँव स्थित है। नन्दगाँव की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) चार मील की है। यहाँ पर कृष्णलीलाओं से सम्बन्धित 56 कुण्ड हैं। जिनके दर्शन में 3–4 दिन लग जाते हैं।

देवाधिदेव महादेव शंकर ने अपने आराध्यदेव श्रीकृष्ण को प्रसन्न कर यह वर माँगा था कि मैं आपकी बाल्यलीलाओं का दर्शन करना चाहता हूँ। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने नन्दगाँव में उन्हें पर्वताकार रूप में स्थित होने का आदेश दिया। श्रीशंकर महादेव भगवान के आदेश से नन्दगाँव में नन्दीश्वर पर्वत के रूप में स्थित होकर अपने आराध्य देव के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। श्रीकृष्ण परम वैष्णव शंकर की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए नन्दीश्वर पर्वत पर ब्रजवासियों विशेषत: नन्दबाबा, यशोदा मैया तथा गोप सखाओं के साथ अपनी बाल्य एवं पौगण्ड अवस्था की मधुर लीलाएँ करते हैं।

द्वापरयुग के अन्त में देवमीढ़ नाम के एक मुनि थे। उनकी दो पत्नियाँ थीं। एक क्षत्रिय वंश की, दूसरी गोप वंश की थीं। पहली क्षत्रिय पत्नी से शूरसेन तथा दूसरी गोपपत्नी से पर्जन्य गोप पैदा हुये। शूरसेन से वसुदेव आदि क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न हुए। पर्जन्य गोप कृषि और गोपालन के द्वारा अपना जीवन निर्वाह करते थे। पर्जन्य गोप अपनी पत्नी वरीयसी गोपी के साथ नन्दीश्वर पर्वत के निकट निवास करते थे। देवर्षि नारद भ्रमण करते–करते एक समय वहाँ आये। पर्जन्यगोप ने विधिवत पूजा के द्वारा उनको प्रसन्न कर उनसे उत्तम सन्तान प्राप्त करने के लिए आशीर्वाद माँगा। नारद जी ने उनको लक्ष्मीनारायण मन्त्र की दीक्षा दी और कहा, इस मन्त्र का जप करने से तुम्हें उत्तम सन्तान की प्राप्ति होगी। नारद जी के चले जाने पर वे पास ही तड़ाग तीर्थ में स्नान कर वहीं गुरुप्रदत्त मन्त्र का प्रतिदिन नियमानुसार जप करने लगे। एक समय मन्त्र जप के समय आकाशवाणी हुई कि- हे पर्जन्य! तुमने ऐकान्तिक रूप में मेरी आराधना की है। तुम परम सौभाग्यवान हो। समस्त गुणों से गुणवान तुम्हारे पाँच पुत्र होंगे। उनमें से मध्यम पुत्र नन्द होगा, जो महासौभाग्यवान होगा। सर्वविजयी, षडैश्वर्यसम्पन्न, प्राणीमात्र के लिए आनन्ददायक श्रीहरि स्वयं उनके पुत्र के रूप में प्रकट होंगे। ऐसी आकाशवाणी सुनकर पर्जन्यगोप बहुत प्रसन्न हुए। कुछ दिनों के पश्चात् उन्हें पाँच पुत्र और दो कन्याएँ पैदा हुई। वे कुछ और दिनों तक नन्दीश्वर पर्वत के निकट रहे, किन्तु कुछ दिनों के बाद केशी दैत्य के उपद्रव से भयभीत होकर वे अपने परिवार के साथ गोकुल महावन में जाकर बस गये। वहीं मध्यमपुत्र नन्दमहाराज के पुत्र के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्णचन्द्र प्रकट हुए।

नन्दगाँव का दृश्य

कुछ समय बाद वहाँ महावन में भी पूतना, शकटासुर तथा तृणावर्त आदि दैत्यों के उत्पाद को देखकर व्रजेश्वर श्रीनन्दमहाराज अपने पुत्रादि परिवार वर्ग तथा गो, गोप, गोपियों के साथ छटीकरा ग्राम में, फिर वहाँ से काम्यवन, खेलनवन आदि स्थानों से होकर पुन: नन्दीश्वर (नन्दगाँव) में लौटकर यहीं निवास करने लगे। यहीं पर कृष्ण की बाल्य एवं पौगण्ड की बहुत सी लीलाएँ हुई। यहीं से गोपाष्टमी के दिन पहले बछड़ों और बछड़ियों को तथा दो–चार वर्षों के बाद गोपाष्टमी के दिन से ही कृष्ण और बलदेव सखाओं के साथ गायों को लेकर गोचारण के लिए जाने लगे। यहाँ नन्दगाँव में कृष्ण की बहुत सी दर्शनीय लीलास्थलियाँ है।

लट्ठमार होली

लट्ठामार होली

बरसाना और नंदगाँव की लठमार होली तो जगप्रसिद्ध है। "नंदगाँव के कुँवर कन्हैया, बरसाने की गोरी रे रसिया" और ‘बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ गीतों के साथ ही ब्रज की होली की मस्ती शुरू होती है। वैसे तो होली पूरे भारत में मनाई जाती है लेकिन ब्रज की होली ख़ास मस्ती भरी होती है. वजह ये कि इसे कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है। उत्तर भारत के बृज क्षेत्र में बसंत पंचमी से ही होली का चालीस दिवसीय उत्सव आरंभ हो जाता है। नंदगाँव एवं बरसाने से ही होली की विशेष उमंग जागृत होती है। जब नंदगाँव के गोप गोपियों पर रंग डालते, तो नंदगांवकी गोपियां उन्हें ऐसा करनेसे रोकती थीं और न माननेपर लाठी मारना शुरू करती थीं। होली की टोलियों में नंदगाँव के पुरुष होते हैं क्योंकि कृष्ण यहीं के थे और बरसाने की महिलाएं क्योंकि राधा बरसाने की थीं। दिलचस्प बात ये होती है कि ये होली बाकी भारत में खेली जाने वाली होली से पहले खेली जाती है। दिन शुरू होते ही नंदगाँव के हुरियारों की टोलियाँ बरसाने पहुँचने लगती हैं. साथ ही पहुँचने लगती हैं कीर्तन मंडलियाँ। इस दौरान भाँग-ठंढई का ख़ूब इंतज़ाम होता है। ब्रजवासी लोगों की चिरौंटा जैसी आखों को देखकर भाँग ठंढई की व्यवस्था का अंदाज़ लगा लेते हैं। बरसाने में टेसू के फूलों के भगोने तैयार रहते हैं। दोपहर तक घमासान लठमार होली का समाँ बंध चुका होता है। नंदगाँव के लोगों के हाथ में पिचकारियाँ होती हैं और बरसाने की महिलाओं के हाथ में लाठियाँ, और शुरू हो जाती है होली।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यत्र नन्दोपनन्दास्ते प्रति नन्दाधिनन्दना:। चक्रुर्वासं सुखस्थानं यतोनन्दाभिधानकम्।। (आदिपुराण
  2. भवसागर से भयभीत कोई श्रुतियों का, कोई स्मृतियों का और कोई भले ही महाभारत का भजन करता है तो वह वैसा करे, परन्तु मैं नन्दबाबा की अहर्निश वन्दना करता हूँ, जिनके आँगन में परम–ब्रह्म घुटनों से इधर–उधर चलते हैं।

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