माहिष्मती  

माहिष्मती
महेश्वर का क़िला
विवरण 'माहिष्मति' मध्य प्रदेश का प्राचीन नगर था, जिसके अभिज्ञान आज के खरगौन ज़िले में स्थित धार्मिक शहर 'महेश्वर' से किया गया है।
राज्य मध्य प्रदेश
ज़िला खरगौन
भौगोलिक स्थिति इंदौर से 91 किलोमीटर की दूरी पर स्थित।
प्रसिद्धि मंदिर, ऐतिहासिक इमारतें
क्या देखें 'महेश्वर क़िला', 'कालेश्वर मंदिर', 'राजराजेश्वर मंदिर', 'विट्ठलेश्वर मंदिर', 'अहिल्येश्वर मंदिर', 'वांचू पॉइन्ट' तथा घाट आदि।
कहाँ ठहरें गेस्ट हाउस, रेस्ट हाउस तथा धर्मशालाएं
अन्य जानकारी महेश्वर क़िले के अंदर अहिल्याबाई का पूजा स्थल है, जहाँ पर अनेकों धातु के तथा पत्थर के अलग-अलग आकार के शिवलिंग, कई सारे देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और एक सोने का बड़ा-सा झुला है, जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है।

माहिष्मति मध्य प्रदेश के खरगौन ज़िले में स्थित धार्मिक नगर 'महेश्वर' का प्राचीन नाम।

इतिहास

चेदि जनपद की राजधानी 'माहिष्मति'[1], जो नर्मदा के तट पर स्थित थी, इसका अभिज्ञान ज़िला इंदौर, मध्य प्रदेश में स्थित 'महेश्वर' नामक स्थान से किया गया है, जो पश्चिम रेलवे के अजमेर-खंडवा मार्ग पर बड़वाहा स्टेशन से 35 मील दूर है। महाभारत के समय यहाँ राजा नील का राज्य था, जिसे सहदेव ने युद्ध में परास्त किया था[2]-

'ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ। तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभ:।'[3]

राजा नील महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था। बौद्ध साहित्य में माहिष्मति को दक्षिण अवंति जनपद का मुख्य नगर बताया गया है। बुद्ध काल में यह नगरी समृद्धिशाली थी तथा व्यापारिक केंद्र के रूप में विख्यात थी। तत्पश्चात् उज्जयिनी की प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ-साथ इस नगरी का गौरव कम होता गया। फिर भी गुप्त काल में 5वीं शती तक माहिष्मति का बराबर उल्लेख मिलता है। कालिदास ने 'रघुवंश' में इंदुमती के स्वयंवर के प्रसंग में नर्मदा तट पर स्थित माहिष्मति का वर्णन किया है और यहाँ के राजा का नाम 'प्रतीप' बताया है-

'अस्यांकलक्ष्मीभवदीर्घबाहो माहिष्मतीवप्रनितंबकांचीम् प्रासाद-जालैर्जलवेणि रम्यां रेवा यदि प्रेक्षितुमस्तिकाम:।'[4]

इस उल्लेख में माहिष्मती नगरी के परकोटे के नीचे कांची या मेखला की भाति सुशोभित नर्मदा का सुंदर वर्णन है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पाली 'माहिस्सती'
  2. 2.0 2.1 2.2 ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 742 |
  3. महाभारत, सभापर्व 32,21
  4. रघुवंश 6,43
  5. रघुवंश 6,37
  6. जल के निकट स्थित
  7. हरिवंश पुराण 7,19

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