ओंकारेश्वर  

(ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग से पुनर्निर्देशित)


ओंकारश्वर ज्योतिर्लिंग
Omkareshwar Jyotirlinga

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के साथ ही अमलेश्वर ज्येतिर्लिंग भी है। इन दोनों शिवलिंगों की गणना एक ही ज्योतिर्लिंग में की गई है। ओंकारेश्वर स्थान भी मालवा क्षेत्र में ही पड़ता है। स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड में श्री ओंकारेश्वर की महिमा का बखान किया गया है-

देवस्थानसमं ह्येतत् मत्प्रसादाद् भविष्यति।
अन्नदानं तप: पूजा तथा प्राणविसर्जनम्।
ये कुर्वन्ति नरास्तेषां शिवलोकनिवासनम्।।[1]

अर्थात् ‘ओंकारेश्वर तीर्थ अलौकिक है। भगवान शंकर की कृपा से यह देवस्थान के समान ही हैं। जो मनुष्य इस तीर्थ में पहुँचकर अन्नदान, तप, पूजा आदि करता है अथवा अपना प्राणोत्सर्ग यानि मृत्यु को प्राप्त होता है, उसे भगवान शिव के लोक में स्थान प्राप्त होता है।’

अमराणां शतैशचैव संवितो हामरेश्वर:।
तथैव ऋषिसंघैशच तेन पुण्यतमो महान्।।[2]

अर्थात् ‘महान पुण्यशाली अमरेश्वर (ओंकारेश्वर) तीर्थ हमेशा सैकड़ों देवताओं तथा ऋषि-महर्षि का अत्यन्त पवित्र तीर्थ है।’

मान्धाता पर्वत

नर्मदा नदी के दो धाराओं के बंटने से एक टापू का निर्माण हो गया है, इसे शिवपुरी भी कहा जाता है। नर्मदा की विभक्त धारा दक्षिण की ओर जाती है। दक्षिण की ओर बहने वाली धारा ही प्रधान मानी जाती है, जिसे नाव (नौका) के द्वारा पार किया जाता है। नर्मदा के इस किनारे पर पक्के घाटों का निर्माण कराया गया है। इसी मान्धाता नामक पर्वत पर भगवान ओंकारेश्वर-महादेव विराजमान हैं। इतिहास प्रसिद्ध भगवान के महान् भक्त अम्बरीष और मुचुकुन्द के पिता सूर्यवंशी राजा मान्धाता ने इस स्थान पर कठोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया था। वे एक महान् तपस्वी और विशाल महायज्ञों के कर्त्ता थे। उस महान् पुरुष मान्धाता के नाम पर ही इस पर्वत का नाम मान्धाता पर्वत हो गया। यहाँ के ज़्यादातर मन्दिरों का निर्माण पेशवा राजाओं द्वारा ही कराया गया था। ऐसा बताया जाता है कि भगवान ओंकारेश्वर का मन्दिर भी उन्हीं पेशवाओं द्वारा ही बनवाया गया है। इस मन्दिर में दो कमरों (कक्षों) के बीच से होकर जाना पडता है। चूँकि भीतर अन्धेरा रहता है, इसलिए वहाँ हमेशा दीपक जलाया जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड-अध्याय-22
  2. स्कन्द पुराण, रेवा खण्ड-अध्याय- 28
  3. पर्वत की चोटियाँ
  4. चोटी
  5. उनके द्वारा इच्छा किया गया
  6. शिव महापुराण कोटि रुद्र संहिता, अध्याय 18/22-24
  7. बनावट

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