असीरगढ़  

असीरगढ़ क़िला

असीरगढ़ क़िला बुरहानपुर से लगभग 20 किमी. की दूरी पर उत्तर दिशा में सतपुड़ा पहाड़ियों के शिखर पर समुद्र सतह से 750 फ़ुट की ऊँचाई पर स्थित है। यह क़िला आज भी अपने वैभवशाली अतीत की गुणगाथा का गान मुक्त कंठ से कर रहा है। इसकी तत्कालीन अपराजेयता स्वयं सिद्ध होती है। इसकी गणना विश्व विख्यात उन गिने चुने क़िलों में होती है, जो दुर्भेद और अजेय, माने जाते थे।

इतिहास

इतिहासकारों ने इसका 'बाब-ए-दक्खन' (दक्षिण द्वार) और 'कलोद-ए-दक्खन' (दक्षिण की कुँजी) के नाम से उल्लेख किया है, क्योंकि इस क़िले पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् दक्षिण का द्वार खुल जाता था, और विजेता का सम्पूर्ण ख़ानदेश क्षेत्र पर अधिपत्य स्थापित हो जाता था। इस क़िले की स्थापना कब और किसने की यह विश्वास से नहीं कहा जा सकता। इतिहासकार स्पष्ट एवं सही राय रखने में विवश रहे हैं। कुछ इतिहासकार इस क़िले का महाभारत के वीर योद्धा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा की अमरत्व की गाथा से संबंधित करते हुए उनकी पूजा स्थली बताते हैं। बुरहानपुर के 'गुप्तेश्वर  महादेव मंदिर' के समीप से एक सुंदर सुरंग है, जो असीरगढ़ तक लंबी है। ऐसा कहा जाता है कि, पर्वों के दिन अश्वत्थामा ताप्ती नदी में स्नान करने आते हैं, और बाद में 'गुप्तेश्वर' की पूजा कर अपने स्थान पर लौट जाते हैं।[1]

क़िले का नामकरण

कुछ इतिहासकार इसे रामायण काल का बताते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार 'मोहम्मद कासिम' के कथनानुसार इसका 'आशा अहीर' नामक एक व्यक्ति ने निर्माण कराया था। आशा अहीर के पास हज़ारों की संख्या में पशु थे। उनकी सुरक्षा हेतु ऐसे ही सुरक्षित स्थान की आवश्यकता थी। कहते हैं, वह इस स्थान पर आठवीं शताब्दी में आया था। इस समय यहाँ हज़रत नोमान चिश्ती नाम के एक तेजस्वी सूफ़ी संत निवास करते थे। आशा अहीर उनके पास आदरपूर्वक उपस्थित हुआ और निवेदन किया कि उसके व परिवार की सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करें, ताकि वह क़िले पर अपने परिवार सहित रह सके। इस तरह वह हज़रत नोमान की आज्ञा एवं आशीर्वाद पाकर, इस स्थान पर ईट मिट्टी, चूना और पत्थरों की दीवार बनाकर रहने लगा। इस तरह आशा अहीर के नाम से यह क़िला असीरगढ़ नाम से प्रसिद्ध हो गया।

  • असीरगढ़ कुछ समय के लिए चौहान वंश के राजाओं के आधिपत्य में भी रहा था, जिसका उल्लेख राजपूताना के इतिहासकारों ने संदर्भ में किया हैं।
असीरगढ़ क़िला

नसीर ख़ाँ फ़ारूक़ी का अधिकार

कुछ समय बाद असीरगढ़ क़िले की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फेल गई। फ़िरोज़शाह तुग़लक़ के एक सिपाही मलिक ख़ाँ के पुत्र नसीर ख़ाँ फ़ारूक़ी को असीरगढ़ की प्रसिद्धि ने प्रभावित किया। वह बुरहानपुर आया। उसने आशा अहीर से भेंट कर निवेदन किया कि "मेरे भाई और बलकाना के ज़मीदार मुझे पेरशान करते रहते हैं, एवं मेरी जान के दुश्मन बने हुए हैं। इसलिए आप मेरी सहायता करें और मेरे परिवार के लोगों को इस सुरक्षित स्थान पर रहने की अनुमति दें, तो कृपा होगी" आशा अहीर उदार व्यक्ति था, उसने नसीर ख़ाँ की बात पर विश्वास करके उसे क़िले में रहने की आज्ञा दे दी। नसीर ख़ाँ ने पहले तो कुछ डोलियों में महिलाओं और बच्चों को भिजवाया और कुछ में हथियारों से सुसज्जित सिपाही योद्धाओं को भेजा। आशा अहीर और उसके पुत्र स्वागत के लिए आये। जैसे ही डोलियों ने क़िले में प्रवेश किया, डोलियों में से निकलकर एकदम आशा अहीर और उसके पुत्रों पर हमला किया गया और उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। इस प्रकार देखते ही देखते नसीर ख़ाँ फ़ारूक़ी का इस क़िले पर अधिकार हो गया। आदिलशाह फ़ारूक़ी के देहांत के बाद असीरगढ़ का क़िला बहादुरशाह के अधिकार में आ गया था। वह दूर दृष्टि वाला बादशाह नहीं था। उसने अपनी और क़िले की सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 1.5 असीरगढ (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 16 जून, 2011।

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=असीरगढ़&oldid=598649" से लिया गया