पी. जयराज  

पी. जयराज
जयराज
पूरा नाम पैदी जयराज
प्रसिद्ध नाम जयराज
जन्म 28 सितम्बर, 1909
जन्म भूमि करीमनगर, आंध्र प्रदेश
मृत्यु 11 अगस्त, 2000
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
संतान पाँच (दो पुत्र दिलीप, जयतिलक और तीन पुत्रियाँ जयश्री, दीपा एवं गीता)
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, निर्माता-निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'हमारी बात', 'नई कहानी', 'शिकारी', 'रायफल गर्ल', 'भाभी' आदि।
शिक्षा स्नातक
विद्यालय वुड नेशनल कॉलेज, हैदराबाद
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अपने फ़िल्मी कैरियर में बतौर अभिनेता तो लगभग 300 फ़िल्मों में अभिनय किया जिनमें से 160 फ़िल्मों में नायक की भूमिकाएँ निभाईं।

पी. जयराज (पूरा नाम- 'पैदी जयराज', अंग्रेज़ी: Paidi Jairaj, जन्म: 28 सितम्बर, 1909; मृत्यु: 11 अगस्त, 2000) हिन्दी फ़िल्म जगत् के एकमात्र ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने मूक फ़िल्मों के दौर से लेकर वर्तमान दौर तक की अनेक फ़िल्मों में काम किया। हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर सर्वाधिक राष्ट्रीय और ऐतिहासिक नायकों को जीवित करने का कीर्तिमान इसी कलाकार के साथ जुड़ा है। नौशाद जैसे महान् संगीतकार को फ़िल्मों में ब्रेक देने का श्रेय भी पी. जयराज को ही जाता है। उनकी ज़िंदगी हिन्दी सिने जगत् के इतिहास के साथ-साथ चलती हुई, एक सिनेमा की कहानी जैसी थी।

जीवन परिचय

जयराज का जन्म 28 सितम्बर, 1909 को निजाम स्टेट के करीमनगर ज़िले में हुआ था। 'पाइदीपाटी जैरुला नाइडू' उनका आन्ध्रीय नाम था। हैदराबाद में पले बड़े हुए जिससे उर्दू भाषा पर पकड़ अच्छी थी, वो काम आयी। उनके पिताजी सरकारी दफ्तर में लेखाजोखा देखा करते थे। उनकी प्रारंम्भिक शिक्षा हैदराबाद के रोमन कैथोलिक स्कूल में हुई। फिर तीन साल के लिए उन्हें 'वुड नेशनल कॉलेज' के बॉडिंग हाउस में पढ़ाया गया जहां से उन्होंने संस्कृत की शिक्षा ली। फिर हैदराबाद के 'निजाम हाईस्कूल' में उर्दू पढी। बी. एस. सी. करने के बाद नेवी में जाना चाह्ते थे किंतु उनके बडे भाई सुन्दरराज इंजीनिय्ररिंग की पढाई के लिए लंदन भेजना चाह्ते थे। उनकी माताजी बड़े भाई को ज्यादा प्यार देतीं थीं और उनकी इच्छा थी इंग्लैंड जाकर पढाई करने की जिसका परिवार ने विरोध किया जिससे नाराज होकर, युवा जयराज, किस्मत आजमाने के लिए सन् 1929 में मुम्बई आ गये। उस समय उनकी उम्र 19 वर्ष थी।

समुन्दर के साथ पहले से बहुत लगाव था सो, डॉक यार्ड में काम करने लगे ! वहाँ उनका एक दोस्त था जिसका नाम "रंग्या" था उसने सहायता की और तब, पोस्टर को रंगने का काम मिला जिससे स्टूडियो पहुंचे। उनकी मजबूत कद काठी ने जल्द ही उन्हें निर्माता की आंखों में चढ़ा दिया। महावीर फोटोप्लेज़ में काम मिला। उस समय चित्रपट मूक थे। कई जगह काम, ऐक्टर के बदले खड़े डबल का मिला, पर बाद में मुख्य भूमिकाएँ भी मिलने लगीं। भाभा वारेरकर उनके आकर्षक और सौष्ठव शरीर को देखकर उनके व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म में नायक की भूमिका के लिए चुन लिया। दुर्भाग्य से यह फ़िल्म बीच में ही बंद हो गई क्योंकि वारेरकर का अपने पार्टनर के साथ मनमुटाव हो गया था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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