मजरूह सुल्तानपुरी  

मजरूह सुल्तानपुरी
मजरूह सुल्तानपुरी
पूरा नाम असरार उल हसन ख़ान
प्रसिद्ध नाम मजरूह सुल्तानपुरी
जन्म 1 अक्टूबर, 1919
जन्म भूमि सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 24 मई, 2000
मृत्यु स्थान मुम्बई
कर्म भूमि मुम्बई, भारत
कर्म-क्षेत्र गीतकार और उर्दू शायर
मुख्य फ़िल्में 'अंदाज', 'साथी', 'पाकीजा', 'तांगेवाला', 'धरमकांटा', 'पेइंग गेस्ट', 'नौ दो ग्यारह', 'काला पानी', 'चलती का नाम गाड़ी', 'बंबई का बाबू', 'तीन देवियां', 'ज्वैलथीफ़' और 'अभिमान' आदि।
विद्यालय तकमील उल तीब कॉलेज
पुरस्कार-उपाधि 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (1993), फ़िल्म फ़ेयर, 'राष्ट्रीय इक़बाल सम्मान' (1991-92)
नागरिकता भारतीय

मजरूह सुल्तानपुरी (अंग्रेज़ी: Majrooh Sultanpuri; जन्म- 1 अक्टूबर, 1919, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 24 मई, 2000, मुम्बई) भारतीय हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। इनका पूरा नाम 'असरार उल हसन ख़ान' था। इनके लिखे हुए कलाम में ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से रूबरू कराने की ज़बरदस्त क्षमता थी। मजरूह की कलम की स्याही नज्मों के रूप में एक ऐसी गाथा के रूप में चारों ओर फैली, जिसने उर्दू शायरी को महज मोहब्बत के सब्जबाग़ों से निकालकर दुनिया के दीगर स्याह सफ़ेद पहलुओं से भी जोड़ा। इसके साथ ही उन्होंने रूमानियत को भी नया रंग और ताजगी प्रदान करने की पूरी कोशिश की, जिसमें वह काफ़ी हद तक सफल भी हुए। मजरूह सुल्तानपुरी ने चार दशक से भी ज़्यादा अपने लंबे सिने कैरियर में क़रीब 300 फ़िल्मों के लिए लगभग 4000 गीतों की रचना की है।

जन्म तथा शिक्षा

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर शहर में अक्टूबर, 1919 को हुआ था। उनके पिता एक पुलिस उप-निरीक्षक थे। पिता मजरूह सुल्तानपुरी को ऊंची से ऊंची तालीम देना चाहते थे। मजरूह ने लखनऊ के "तकमील उल तीब कॉलेज' से यूनानी पद्धति की मेडिकल की परीक्षा उर्तीण की थी। इसके बाद में वे एक हकीम के रूप में काम करने लगे थे। बचपन के दिनों से ही मजरूह सुल्तानपुरी को शेरो-शायरी करने का काफ़ी शौक़ था और वे अक्सर सुल्तानपुर में हो रहे मुशायरों में हिस्सा लिया करते थे। इस दौरान उन्हें काफ़ी नाम और शोहरत भी मिली। उन्होंने अपनी मेडिकल की प्रैक्टिस बीच में ही छोड़ दी और अपना सारा ध्यान शेरो-शायरी की ओर लगाना शुरू कर दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात मशहूर शायर 'जिगर मुरादाबादी' से हुई।[1]

मुम्बई आगमन

वर्ष 1945 में 'सब्बो सिद्धकी इंस्टीट्यूट' द्वारा संचालित एक मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए मजरूह सुल्तानपुरी मुम्बई (भूतपूर्त बम्बई) आए। मुशायरे के कार्यक्रम में उनकी शायरी सुनकर मशहूर निर्माता ए.आर. कारदार उनसे काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने मजरूह सुल्तानपुरी से अपनी फ़िल्म के लिए गीत लिखने की पेशकश की। मजरूह ने कारदार साहब की इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि फ़िल्मों के लिए गीत लिखना वे अच्छी बात नहीं समझते थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 मजरूह सुल्तानपुरी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 17 जुलाई, 2012।

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