राज कपूर  

राज कपूर
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पूरा नाम रणबीर राज कपूर
अन्य नाम शोमैन
जन्म 14 दिसंबर, 1924
जन्म भूमि पेशावर, पाकिस्तान
मृत्यु 2 जून, 1988
मृत्यु स्थान नई दिल्ली
अभिभावक पृथ्वीराज कपूर
पति/पत्नी कृष्णा मल्होत्रा
संतान रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, राजीव कपूर, रितु नन्दा, रीमा जैन।
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अभिनेता, निर्माता व निर्देशक
मुख्य फ़िल्में आग, नीलकमल, मेरा नाम जोकर, जागते रहो, आवारा, श्री 420, राम तेरी गंगा मैली आदि।
पुरस्कार-उपाधि दादा साहब फाल्के पुरस्कार, पद्म भूषण, 9 बार फ़िल्मफेयर पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
फ़िल्माये गीत 'मेरा जूता है जापानी', 'आवारा हूँ' और 'ए भाई ज़रा देख के चलो', किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, प्यार हुआ इकरार हुआ, जीना यहाँ मरना यहाँ
अन्य जानकारी राज कपूर ने 1947 में आर. के. फ़िल्म्स एंड स्टूडियो की स्थापना की थी।
अद्यतन‎

रणबीर राज कपूर (अंग्रेज़ी: Raj Kapoor, जन्म- 14 दिसंबर, 1924, पेशावर, पाकिस्तान[1]; मृत्यु- 2 जून, 1988, नई दिल्ली), हिन्दी फ़िल्म अभिनेता, निर्माता व निर्देशक थे। राज कपूर भारत, मध्य-पूर्व, तत्कालीन सोवियत संघ और चीन में भी अत्यधिक लोकप्रिय हैं। राज कपूर को अभिनय विरासत में ही मिला था। इनके पिता पृथ्वीराज अपने समय के मशहूर रंगकर्मी और फ़िल्म अभिनेता हुए हैं। राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर ने अपने पृथ्वी थियेटर के जरिए पूरे देश का दौरा किया। राज कपूर भी उनके साथ जाते थे और रंगमंच पर काम भी करते थे। पृथ्वीराज कपूर और राज कपूर दोनों को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। राज कपूर हिन्दी सिनेमा जगत् का वह नाम है, जो पिछले आठ दशकों से फ़िल्मी आकाश पर जगमगा रहा है और आने वाले कई दशकों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। राज कपूर की फ़िल्मों की पहचान उनकी आँखों का भोलापन ही रहा है।

जीवन परिचय

पृथ्वीराज कपूर के सबसे बड़े बेटे राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर 1924 को पेशावर में हुआ था। उनका बचपन का नाम रणबीर राज कपूर था। राज कपूर की स्कूली शिक्षा कोलकाता में हुई, लेकिन पढ़ाई में उनका मन कभी नहीं लगा। यही कारण था कि राज कपूर ने 10वीं कक्षा की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। इस मनमौजी ने अपने विद्यार्थी जीवन में किताबें बेचकर खूब केले, पकोड़े और चाट खाई।

राज कपूर स्टाम्प

सन् 1929 में जब पृथ्वीराज कपूर मुंबई आए, तो उनके साथ मासूम राज कपूर भी आ गए। पृथ्वीराज कपूर सिद्धांतों के पक्के इंसान थे। राज कपूर को उनके पिता ने साफ़ कह दिया था कि राजू, नीचे से शुरुआत करोगे तो ऊपर तक जाओगे। राज कपूर ने पिता की यह बात गाँठ बाँध ली और जब उन्हें सत्रह वर्ष की उम्र में रणजीत मूवीटोन में साधारण एप्रेंटिस का काम मिला, तो उन्होंने वजन उठाने और पोंछा लगाने के काम से भी परहेज नहीं किया। काम के प्रति राज कपूर की लगन पंडित केदार शर्मा के साथ काम करते हुए रंग लाई, जहाँ उन्होंने अभिनय की बारीकियों को समझा। एक बार राज कपूर ने ग़लती होने पर केदार शर्मा से चाँटा भी खाया था। उसके बाद एक समय ऐसा भी आया, जब केदार शर्मा ने अपनी फ़िल्म 'नीलकमल' (1947) में मधुबाला के साथ राज कपूर को नायक के रूप में प्रस्तुत किया।

नीलकमल

केदार शर्मा उस समय के नामचीन निर्देशकों में से एक थे। केदार शर्मा ने राज कपूर को क्लैपर ब्वॉय के रूप में भरती कर लिया। एक दिन की बात है किसी शॉट को फ़िल्माने के दौरान राज कपूर ने क्लैप को इतनी ज़ोर से टकराया कि अभिनेता की नकली दाढ़ी उसमें फंसकर बाहर आ गई। केदार शर्मा ने गुस्से में राज कपूर को जोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया। थप्पड़ ने अपना काम किया और राज कपूर को बाद में केदार शर्मा के निर्देशन में ही 'नीलकमल" मिल गई। इस फ़िल्म में मधुबाला उनकी नायिका थीं।[2]

अभिनय की शुरुआत

राज कपूर ने 1930 के दशक में बॉम्बे टॉकीज़ में क्लैपर-बॉय और पृथ्वी थिएटर में एक अभिनेता के रूप में काम किया, ये दोनों कंपनियाँ उनके पिता पृथ्वीराज कपूर की थीं। राज कपूर बाल कलाकार के रूप में 'इंकलाब' (1935) और 'हमारी बात' (1943), 'गौरी' (1943) में छोटी भूमिकाओं में कैमरे के सामने आ चुके थे। राज कपूर ने फ़िल्म 'वाल्मीकि' (1946), 'नारद और अमरप्रेम' (1948) में कृष्ण की भूमिका निभाई थी। इन तमाम गतिविधियों के बावज़ूद उनके दिल में एक आग सुलग रही थी कि वे स्वयं निर्माता-निर्देशक बनकर अपनी स्वतंत्र फ़िल्म का निर्माण करें। उनका सपना 24 साल की उम्र में फ़िल्म 'आग' (1948) के साथ पूरा हुआ। राज कपूर ने पर्दे पर पहली प्रमुख भूमिका 'आग' (1948) में निभाई, जिसका निर्माण और निर्देशन भी उन्होंने स्वयं किया था। इसके बाद राज कपूर के मन में अपना स्टूडियो बनाने का विचार आया और चेम्बूर में चार एकड़ ज़मीन लेकर 1950 में उन्होंने अपने आर. के. स्टूडियो की स्थापना की और 1951 में 'आवारा' में रूमानी नायक के रूप में ख्याति पाई। राज कपूर ने 'बरसात' (1949), 'श्री 420' (1955), 'जागते रहो' (1956) व 'मेरा नाम जोकर' (1970) जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन व लेखन किया और उनमें अभिनय भी किया। उन्होंने ऐसी कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें उनके दो भाई शम्मी कपूरशशि कपूर और तीन बेटे रणधीर, ऋषि व राजीव अभिनय कर रहे थे। यद्यपि उन्होंने अपनी आरंभिक फ़िल्मों में रूमानी भूमिकाएँ निभाईं, लेकिन उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध चरित्र 'चार्ली चैपलिन' का ग़रीब, लेकिन ईमानदार 'आवारा' का प्रतिरूप है। उनका यौन बिंबों का प्रयोग अक्सर परंपरागत रूप से सख्त भारतीय फ़िल्म मानकों को चुनौती देता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आज़ादी से पहले भारत में था
  2. बख्शी, मयूर मलहार। राज कपूर (हिन्दी) (एच टी एम एल) चलो सिनेमा। अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर, 2010
  3. नीली आँखों का जादूगर राज कपूर (हिन्दी) (एच टी एम एल) संवेदनाओं के पंख। अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर, 2010
  4. राज कपूर (हिन्दी) (एच टी एम एल) जागरण। अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर, 2010
  5. राज कपूर (हिन्दी) (एच टी एम एल) संगम तीरे। अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर, 2010
  6. राज कपूर (हिन्दी) (एच टी एम एल) जागरण। अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर, 2010
  7. जीना एसी का नाम है (हिन्दी) (एच टी एम) वेबदुनिया। अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर, 2010

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