चुनार  

चुनार क़िले से गंगा का दृश्य

चुनार उत्तर प्रदेश राज्य के मिर्ज़ापुर ज़िले में विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा तट पर स्थित है। इसका प्राचीन नाम 'चरणाद्रि' था। चौदहवीं शताब्दी में यह चंदेलों के अधिकार में था। सोलहवीं शताब्दी में चुनार को बिहार तथा बंगाल को जीतने के किए पहला बड़ा नाका समझा जाता था।

नामकरण

बनारस से 39 मील (लगभग 62.4 कि.मी.) और प्रयाग से 75 मील (लगभग 120 कि.मी.) की दूरी पर चुनार स्थित है। कहा जाता है कि यह नाम वहाँ की पहाड़ी की मानवचरण के समान आकृति होने के कारण ही पड़ा है।[1] संभवत: 'धोनसारव' जातक में वर्णित भग्गों की राजधानी 'सुंसुमागिरि' भी इसी पहाड़ी पर बसी हुई थी। चुनार गंगा नदी के किनारे बसा है। जनश्रुति है कि चुनार में गंगा उल्टी बहती है। यहाँ गंगा में एक घुमाव है; नदी उत्तर-पश्चिम की ओर घूमकर फिर पूर्व की ओर मुड़कर काशी की ओर बहती है। घुमाव का कारण चुनार की पहाड़ी की स्थिति है। इसी विशेष स्थिति के कारण चुनार का प्राचीन काल में नदी मार्ग का नाका समझा जाता था।

कालीदास का उल्लेख

संभवत: यह स्थान चुनार के निकट ही था। कुशावती से अयोध्या जाने वाले मार्ग में चुनार की स्थिति स्वाभाविक ही जान पड़ती है। महाकवि कालिदास ने, जो इस विशष्ट स्थान के वर्णन में गंगा की प्रतीप गति बताई है, उससे यह संभव दीखता है कि कवि के ध्यान में चुनार की स्थिति ही रही होगी, क्योंकि किसी अन्य स्थान पर गंगा की उल्टी ओर बहना प्रसिद्ध नहीं हैं। संभव है कि हिन्दी के मुहावरे- 'उलटी गंगा बहना' का संबंध भी चुनार में गंगा के उल्टे प्रवाह से हो।

'रघुवंश'[2] के अनुसार कुशावती से अयोध्या लौटते समय कुश की सेना ने जिस स्थान पर गंगा को पार किया था, वहा गंगा 'प्रतीपगा' या 'पश्चिम-वाहिनी' थी-

'तीर्थे तदीये गजसेतुबंधात्प्रतीपगामुत्तरतोस्यंगगाम्, अयत्नबालव्यजनीवभूवुर्हसानभोलंधनलोलपक्षा:'।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चरण+आद्रि=पहाड़ी
  2. रघुवंश 16, 33
  3. श्री नं. ला. डे के अनुसार पाल राजाओं ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था।
  • ऐतिहासिक स्थानावली | विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार

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