अकथा  

अकथा
कग्यू तिब्बती मठ, सारनाथ
विवरण 'अकथा' एक ऐतिहासिक पुरास्थल है, जो सारनाथ से से 2 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित हैं। यहाँ से पुरा महत्त्व की कई वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला सारनाथ
स्थिति 83°0’ पूर्वी अक्षाँश और 25°22’ उत्तरी देशांतर के मध्य
उत्खनन फ़रवरी-अप्रैल, 2002 के मध्य; पुन: पुन: फ़रवरी-अप्रैल, 2004 के मध्य
संबंधित लेख सारनाथ, राजघाट
अन्य जानकारी 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के प्रो. विदुला जायसवाल एवं डॉ. बीरेन्द्र प्रताप सिंह के संयुक्त निर्देशन में उनके विभागीय सहयोगी डॉ. अशोक कुमार सिंह द्वारा 2002 के मध्य में अकथा का उत्खननकिया गया था।

अकथा एक ऐतिहासिक पुरास्थल है, जो सारनाथ (उत्तर प्रदेश) से से 2 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित हैं। यह पुरास्थल 83°0’ पूर्वी अक्षाँश और 25°22’ उत्तरी देशांतर के मध्य स्थित है। नरोखर नाला के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह पुरास्थल चार वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहाँ उत्खनन कार्य मुख्य रूप से अकथा-1 और अकथा-2 में किया गया। अकथा उत्खनन का नवीनतम साक्ष्य वाराणसी की प्राचीनता को बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित करता है। इस परिप्रेक्ष्य में सारनाथ और राजघाट के प्रारंम्भिक स्तरों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।

उत्खनन कार्य

अकथा का उत्खनन 'प्राचीन भारतीय इतिहास', 'संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग', 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' के प्रो. विदुला जायसवाल एवं डॉ. बीरेन्द्र प्रताप सिंह के संयुक्त निर्देशन में उनके विभागीय सहयोगी डॉ. अशोक कुमार सिंह द्वारा फ़रवरी-अप्रैल, 2002 के मध्य किया गया था।[1] यह उत्खनन कार्य पुन: 2004 फ़रवरी-अप्रैल के मध्य प्रो. विदुला जायसवाल एवं लेखक के संयुक्त निर्देशन में सम्पन्न हुआ। नरोखर नाला के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह पुरास्थल चार वर्ग किलोमीटर, में फैला हुआ है।

सांस्कृतिक काल

उत्खनन कार्य मुख्य रूप से 'अकथा-1' और 'अकथा-2' में किया गया। उत्खनन में चार सांस्कृतिक कालों की सामग्री प्रकाश में आई-

  • प्रथम काल- पूर्व उत्तरी कृष्ण परिमार्जित संस्कृति (प्री एन. बी. पी. काल) (लगभग 1200 ई. पू. से 600 ई. पू. तक)
  • द्वितीय काल- उत्तरी कृष्ण परिमार्जित संस्कृति (600 ई.पू. से 200 ई. पू. तक)
  • तृतीय काल- शुंग कुषाण काल (200 ई. पू. से 300 ईसवी तक)
  • चतुर्थ काल- गुप्तकालीन संस्कृति (300 ईसवी से 600 ईसवी तक)

पुरास्थल-1 - वर्तमान अकथा गाँव के दक्षिण-पश्चिम किनारे पर स्थित है, जहाँ बड़ी संख्या में प्रस्तर प्रतिमाएँ बिखरी पड़ी हैं। यह वही स्थान है, जहाँ से कुछ वर्ष पूर्व एक 'यक्ष' प्रतिमा मिली थी। यह अब सारनाथ संग्रहालय में सुरक्षित है। यह यक्ष प्रतिमा प्रथम-द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व की है। इस क्षेत्र के उत्खनन में ईंटों से निर्मित तीन संरचनाएँ (संरचना-1, संरचना-2, और संरचना-3) मिली है। संरचना-1 के निर्माण में खंउत ईंटों का प्रयोग किया गया है। बनावट के आधार पर यह संरचनाएँ गुप्त काल की प्रतीत होती हैं।

संरचना-2 और 3 एक दीवार के क्षतिग्रस्त भाग हैं। इस दीवार में प्रयुक्त ईंटों की माप 44 X27.5 X6 से.मी. और 44 X26 X6 से.मी. आकार की हैं। यह संरचनाएँ कुषाण काल की हैं। इन सरंचनाओं के नीचे शुंग कालीन तीन क्रमागत फ़र्शों के प्रमाण मिले हैं। इन फ़र्शों को मृदभांड के टुकड़ों और मिट्टी को कूटकर बनाया गया है। 2004 के उत्खनन में मुख्य स्थल पर कुछ कुषाण कालीन संरचनाओं के अवशेष मिले हैं, जो आवासीय प्रमाण नहीं प्रतीत होते हैं। इसके अतिरिक्त दो मुहरें एवं बड़ी संख्या में तांबे के सिक्के भी मिले हैं।

अकथा- 1

अकथा- 1 से प्राप्त मुख्य मृदभांड परंपराएँ कृष्ण लोहित, कृष्ण लेपित, उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड, भूरे रंग के मृत्पात्र एवं लाल रंग के मृत्पात्र हैं। कृष्ण लोहित[2] मृदभांड के कटोरे, तसले, घड़े, कृष्ण लेपित मृदभांड[3], उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड[4]एवं भूरे रंग की थालियाँ एवं कटोरे मुख्य हैं। लाल मृदभांड के कटोरे, घड़े, अवठ रहित हांड़ियां[5] एवं गुलाबपाश[6] बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। अन्य वस्तुओं में ताम्र-शलाका, तांबे, मिट्टी और अर्द्धमूल्यवान पत्थरों के बने मनके, लोढ़े एवं खिलौने तथा पकी मिट्टी की मानव एवं पशु मूर्तियाँ हैं।

अकथा-2

अकथा-2 मुख्य टीले से ½ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है, जो ‘क़ब्रगाह’ के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र अपने में एकल संस्कृत का अस्तित्व छिपाए हुए हैं। आवासीय बस्तियों के निर्माण के लिए ठेकेदारों द्वारा इन टीलों को समतल किये जाने के कारण ययाँ त्वरित निस्तारण कार्य करना पड़ा। यहाँ 3 मी X 3 मी. की 6 खत्तियों में उत्खनन कार्य किया गया। उत्खनन में यहाँ से पूर्व कृष्ण-परिमार्जित संस्कृति के अवशेष प्रकाश में आए हैं, जो ताम्र पाषाण कालीन है। अकथा से अभी कोई कार्बन तिथि नहीं मिली है, लेकिन अन्य स्थलों से प्राप्त मृदभांडों के साथ तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर इस एकल संस्कृति की तिथि 1200-1300 ई.पू. में निर्धारित की जा सकती है।

प्रथम काल की संस्कृति के लोग अपने मकानों के निर्माण में मिट्टी, लकड़ी एवं फूस का प्रयोग करते थे। उत्खनन में चार स्तंभ गर्तों ये युक्त एक फर्श मिला है, जिसे मिट्टी के बर्तनों के छोटे-टुकड़ों एवं मिट्टी को कूटकर सुदृढ़ बनाया गया है। फर्श पर एक चूल्हे के अवशेष भी मिले हैं। यह फर्श अकथा में आवासीय प्रमाण का सबसे प्राचीन साक्ष्य है। उत्खनन में पशुओं की जली हुई हड्डियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं। इसमें से कुछ हड्डियाँ पर काटने के निशान भी हैं, जिससे ज्ञात होता है कि माँस-भक्षण के लिए इन पशुओं का वध किया गया था। इस काल के प्राप्त औज़ारों में पशु-अस्थियों से बने बाणाग्र उल्लेख्य हैं।

अकथा-2 के उत्खनन से प्राप्त मृदभांड कृष्ण लोहित, कृष्ण लेपित एवं लाल प्रकार के हैं। लाल मृदभांडों पर लेप का प्रयोग भी मिलता है। यहाँ के निवासियों को मृदभांड अलंकरण का भी विशेष ज्ञान था। उत्खनन से डोरी छापित, चटाई की छाप युक्त एवं चिपकवा पद्धति से अलंकृत मृदभांगों के टुकड़े प्रथम काल के निचले स्तर से प्राप्त हुए हैं। अकथा उत्खनन का नवीनतम साक्ष्य वाराणसी की प्राचीनता को बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित करता है। इस परिप्रेक्ष्य में सारनाथ और राजघाट के प्रारंम्भिक स्तरों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। नगरीकरण के संदर्भ में यह नवीनतम साक्ष्य एक नई दिशा प्रदान करता है एवं काशी के एक जनपद के रूप में विकसित होने की प्रक्रिया में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा होगा।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वी. जायसवाल, अकथा : ए सैटेलाइअ सेटिलमेन्ट ऑफ़ सारनाथ, वाराणसी (रिपोर्ट ऑफ़ एक्सकैवेशन्स कन्डक्टेड इन द इयर 2002), भारती, अंक 26, 2000-2002, पृ. 61-180.
  2. ब्लैक एंड रेड वेयर
  3. ब्लैक स्लिप्ड
  4. एन.बी.पी. वेयर)
  5. कारिनेटेड
  6. स्प्रिन्कलर

बाहरी कड़ियाँ

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