गीता कर्म योग  

कर्म योग गीता

बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक द्वारा गीता भाष्य

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।[1]गीता 2.50।

यदि किसी मनुष्य को किसी शास्त्र के जानने की इच्छा पहले ही से न हो तो वह उस शास्त्र के ज्ञान को पाने का अधिकारी नहीं हो सकता। ऐसे अधिकार रहित मनुष्य को उस शास्त्र की शिक्षा देना मानो चलनी ही में दूध दुहना है। शिष्य को तो उस शिक्षा से कुछ लाभ होता ही नहीं; परन्तु गुरु को भी निरर्थक श्रम करके समय नष्ट करना पड़ता है। जैमिनि और बादरायण के आरंभ में इसी कारण से अथातो धर्मजिज्ञासा और अथातो ब्रह्माजिज्ञासा कहा हुआ है। जैसे ब्रह्मोपदेश मुमुक्षुओं को और धर्मोपदेश धर्मेच्छुओं को देना चाहिए, वैसे ही कर्म शास्त्रोपदेश उसी मनुष्य को देना चाहिए जिसे यह जानने की इच्छा या जिज्ञासा हो कि संसार में कर्म कैसे करना चाहिए। इसीलिए हमने पहले प्रकरण में 'अथातो' कहकर, दूसरे प्रकरण में कर्म–जिज्ञासा का स्वरूप और कर्म–योगशास्त्र का महत्त्व बतलाया है। जब तक पहले ही से इस बात का अनुभव न कर लिया जाए कि अमुक काम में अमुक रूकावट है, तब तक उस अड़चन से छुटकारा पाने की शिक्षा देने वाला शास्त्र का महत्त्व ध्यान में नहीं आता; और महत्त्व को न जानने से केवल रटा हुआ शास्त्र समय पर ध्यान में रहता भी नहीं है। यही कारण है कि जो सदगुरु हैं वे पहले यह देखते हैं कि शिष्य के मन में जिज्ञासा है या नहीं, और यदि जिज्ञासा न हो तो वे पहले उसी को जाग्रत करने का प्रयत्न किया करते हैं।

गीता में कर्मयोग शास्त्र का विवेचन इसी पद्धति से किया गया है। जब अर्जुन के मन में यह शंका आई कि जिस लड़ाई में मेरे हाथ से पितृवध और गुरुवध होगा तथा जिसमें अपने सब बंधुओं का नाश हो जाएगा, उसमें शामिल होना उचित है या अनुचित; और जब वह युद्ध से पराड़्मुख होकर सन्न्यास लेने को तैयार हुआ और जब भगवान के इस सामान्य युक्तिवाद से भी उसके मन का समाधान नहीं हुआ कि 'समय पर किए जाने वाले कर्म का त्याग करना मूर्खता और दुर्बलता का सूचक है। इससे तुमको स्वर्ग तो मिलेगा ही नहीं, उलटा दुष्कीर्ति अवश्य होगी।' तब श्री भगवान ने पहले

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. इसलिए तू योग का आश्रय ले। कर्म करने की जो रीति, चतुराई या कुशलता है उसे योग कहते हैं। यह 'योग' शब्द की व्याख्या अर्थात् लक्षण है। इसके संबंध में अधिक विचार इसी प्रकरण में आगे चलकर किया है।
  2. महाभारत, शान्ति पर्व, 26.25
  3. जैमिनि सूत्र 4.1.1 और 2
  4. गीता 2.42
  5. गीता. 3.9
  6. गीता' 18.9
  7. गीता. 5.8, 9
  8. गीता, 4.19
  9. कठोपनिषद. 9.11
  10. गीता, 9.22
  11. महाभारत. द्रोण पर्व, 181.31
  12. महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय 172
  13. गीता. 9.12 और 23
  14. गीता 7.25; 9.5; 10.7; 11.8
  15. गीता 18.75
  16. गीता 2.50
  17. गीता 2.39
  18. गीता 2.41–49
  19. गीता. 2.48
  20. गीता. 2.49
  21. गीता. 2.50
  22. गीता. 9.33
  23. गीता 5.2
  24. गीता. 5.4
  25. गीता 9.49
  26. गीता 2.48
  27. गीता 2.50
  28. गीता 4.42
  29. गीता 3.3
  30. महाभारत शान्ति पर्व, 348.56
  31. गीता. 4.1
  32. गीता. 18.75
  33. गीता 4.42
  34. गीता 10.7
  35. महाभारत आश्वमेधिक पर्व,
  36. महाभारत शान्ति पर्व, 240 और 348
  37. मिलिन्द प्रश्न. 1.4
  38. बुद्धचरित 9.19 और 20
  39. गीता 3.20
  40. गीता 4.1–3
  41. गीता 3.3
  42. बृहदारण्यकोपनिषद 1.5.21 और 22; छान्दोग्य उपनिषद 1.2 और 3; कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद 2.8
  43. गीता. 10.32
  44. फ्रांस देश में ऑगस्ट कोंट (Auguste Comte) नामक एक बड़ा पंडित गत शताब्दी में हो चुका है। इसने समाजशास्त्र पर एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखकर बतलाया है कि समाज रचना का शास्त्रीय रीति से किस प्रकार विवेचन करना चाहिए। अनेक शास्त्रों की आलोचना करके इसने यह निश्चय किया है कि किसी भी शास्त्र को ले लो, उसका विवेचन पहले पहल Theological पद्धति से किया जाता है; फिर Metaphysical पद्धति से होता है और अन्त में उसको Positive स्वरूप मिलता है। इन्हीं तीन पद्धतियों को हमने इस ग्रंथ में आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक; ये तीन प्राचीन नाम दिए हैं। ये पद्धतियाँ कुछ कोंट की निकाली हुई नहीं हैं; ये सब पुरानी ही हैं। तथापि उसने उनका ऐतिहासिक क्रम नई रीति से बाँधा है और उनमें आधिभौतिक (Positive) पद्धति को ही श्रेष्ठ बतलाया है; बस इतना ही कोंट का नया शोध है। कोंट के अनेक ग्रंथों का अंग्रेज़ी में भाषान्तर हो गया है।"
  45. गीता 2.7
  46. गीता 2.31
  47. गीता. 3.35
  48. मनुस्मृति, 4.176
  49. शान्ति पर्व, 109.12
  50. महाभारत कर्ण. 69.59
  51. अरस्तू नीतिशास्त्र, 1.7, 8
  52. कान्ट एक जर्मन तत्वज्ञानी था। इसे अर्वाचीन तत्वज्ञान–शास्त्र का जनक समझते हैं। इसके Oritique of Pure Reason (शुद्ध बुद्धि की मीमांसा) और Oritique of Practical Reason (वासनात्मक बुद्धि की मीमांसा) ये दो ग्रंथ प्रसिद्ध है। ग्रीन के ग्रंथ का नाम Prolegomena to Ethics है।
  53. महाभारत, अनुशासन पर्व, 104.157
  54. मनुस्मृति, 1.108
  55. मनुस्मृति, 2.12
  56. जैमिनी सूत्र 1.1.2
  57. मनुस्मृति, 5.56
  58. महाभारत, शान्ति पर्व, 294.29
  59. गीता 3.34
  60. महाभारत, वन पर्व, 312.115
  61. ऐतरेय ब्राह्मण, 3.33
  62. कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद, 3.1 और ऐतरेय ब्राह्मण, 7.28
  63. तैत्तिरीयोपनिषद , 1.11.2
  64. रघुवंश 17.47
  65. वाल्मीकि रामायण. 7.35
  66. महाभारत, वन पर्व, 131.11, 12 और मनुस्मृति, 9.299

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