गीता रहस्य  

गीता रहस्य
गीता रहस्य
लेखक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक
मूल शीर्षक गीता रहस्य
देश भारत
भाषा मराठी
विषय बाल गंगाधर तिलक ने इस पुस्तक में 'श्रीमद्भगवद गीता' के कर्मयोग की वृहद व्याख्या की है। इस ग्रंथ में तिलक ने मनुष्य को उसके संसार में वास्तविक कर्तव्यों का बोध कराया है।
विशेष इस पुस्तक की रचना बाल गंगाधर तिलक ने माण्डला जेल (बर्मा) में की थी। महात्मा गाँधी तो 'गीता' के जबर्दस्त प्रशंसक थे। उसे वह अपनी माता कहते थे।

गीता रहस्य नामक पुस्तक की रचना भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने की थी। यह पुस्तक भगवान श्रीकृष्ण के निष्काम कर्मयोग के विशाल उपवन से चुने हुए आध्यात्मिक सत्यों के सुन्दर गुणों का एक गुच्छा है। इस गुच्छे की व्याख्या विभिन्न महापुरुषों द्वारा समय-समय पर की गई, किंतु इसकी जितनी सरल और स्पष्ट व्याख्या व्यावहारिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बाल गंगाधर तिलक ने की, शायद ही अभी तक किसी अन्य महापुरुष ने की हो।

रचना काल

इस पुस्तक की रचना लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने माण्डला जेल (बर्मा) में की थी। जब भारत पर ब्रिटिश शासन था और 1910 के नवम्बर की शुरुआत थी, तब बर्मा की माण्डला जेल में बाल गंगाधर तिलक कैद थे। वहीं पर एक सुबह उन्होंने महसूस किया कि वर्षों से जिस 'गीता' पर वह लिखना चाहते थे, वह समय आ गया है। अपने धुआंधार राजनीतिक जीवन से उन्हें कोई वक्त मिल नहीं पाता था। लेकिन जब भी वह जेल में होते, तो गीता उनके जेहन में चली आती। वह गीता से बेहद प्रभावित थे, लेकिन उसकी व्याख्या को लेकर परेशान रहते थे। वे अपने समय और समाज के मुताबिक गीता को देखना और समझना चाहते थे। एक थके हुए ग़ुलाम समाज को जगाने के लिए वह गीता को संजीवनी बनाना चाहते थे। जब उन्हें तीसरी बड़ी जेल हुई, तो उन्होंने उस पर काम शुरू कर दिया। वह काम, जिसकी नींव बहुत पहले शायद उनके मन पर पड़ गई थी। सोलह वर्ष की उम्र में तिलक ने अपने मरणासन्न पिता को मराठी में 'गीता' सुनाई थी। तभी से गीता को लेकर एक किस्म का लगाव हो गया था। 'गीता रहस्य' को बाल गंगाधर तिलक ने महज पांच महीने में पेंसिल से ही लिख डाला था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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