गिरनार  

(गिरनार की पहाड़ियाँ से पुनर्निर्देशित)


गिरनार
गिरनार पर्वत
विवरण गिरनार की पहाड़ियों से पश्चिम और पूर्व दिशा में भादस, रोहजा, शतरूंजी और घेलो नदियां बहती हैं। इन पहाड़ियों पर मुख्यतः भील और डुबला लोगों का निवास है।
स्थान जूनागढ़, गुजरात, भारत
ऊँचाई 1,031 मी (3,383 फीट)
भौगोलिक निर्देशांक 21°29′41″ उत्तर, 70°30′20″ पूर्व
ऐतिहासिक उल्लेख यहाँ पर एक चट्टान पर मौर्य सम्राट अशोक का चतुर्दश शिलालेख अंकित है। उसी चट्टान के दूसरी ओर शक क्षत्रप रुद्रदामन का अभिलेख (150ई.) है, जिसमें मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के आदेश से वहाँ पर सुदर्शन झील के निर्माण का उल्लेख है।
तीर्थ स्थल गिरनार जैन मतावलम्बियों का पवित्र तीर्थ स्थान है। यहाँ मल्लिनाथ और नेमिनाथ के स्मारक बने हुए हैं।
गूगल मानचित्र गिरनार
अन्य जानकारी विशाल गिरनार पहाड़ियों में गोरखनाथ शिखर (1,117 मीटर) स्थित है, जिसे एक मृत ज्वालामुखी माना जाता है। गिर पर्वतश्रेणी की एक पहाड़ी पर गिरनार का प्राचीन जैन मंदिर (ऐतिहासिक नाम रौवट या उलाड़थेट) होने के कारण इस पर्वतश्रेणी को पवित्र माना जाता है।

गिरनार (अंग्रेज़ी: Girnar) गुजरात में जूनागढ़ के निकट एक पर्वत का नाम है। गिरनार की पहाड़ियों से पश्चिम और पूर्व दिशा में भादस, रोहजा, शतरूंजी और घेलो नदियां बहती हैं। इन पहाड़ियों पर मुख्यतः भील और डुबला लोगों का निवास है। एशियाई सिंहों के लिए विख्यात 'गिर वन राष्ट्रीय उद्यान' इसी क्षेत्र में स्थित है। खंबलिया, धारी विसावदर, मेंदरदा और आदित्याणा यहाँ के प्रमुख नगर हैं।

इतिहास

गिरनार का प्राचीन नाम 'गिरिनगर' था। महाभारत में उल्लिखित रेवतक पर्वत की क्रोड़ में बसा हुआ प्राचीन तीर्थ स्थल। पहाड़ी की ऊंची चोटी पर कई जैन मंदिर है। यहां की चढ़ाई बड़ी कठिन है। गिरिशिखर तक पहुंचने के लिए सात हज़ार सीढ़ियाँ हैं। इन मंदिरों में सर्वप्रचीन, गुजरात नेरश कुमारपाल के समय का बना हुआ है। दूसरा वास्तुपाल और तेजपाल नामक भाइयों ने बनवाया था। इसे तीर्थंकर मल्लिनाथ का मंदिर कहते हैं। यह विक्रम संवत् 1288 (1237 ई.) में बना था। तीसरा मंदिर नेमिनाथ का है, जो 1277 ई. के लगभग तैयार हुआ था। यह सबसे अधिक विशाल और भव्य है।

प्रचीन काल में इन मंदिरों की शोभा बहुत अधिक थी, क्योंकि इनमें सभामंडप, स्तंभ, शिखर, गर्भगृह आदि स्वच्छ संगमरमर से निर्मित होने के कारण बहुत चमकदार और सुंदर दिखते थे। अब अनेकों बार मरम्मत होने से इनका स्वाभाविक सोंदर्य कुछ फीका पड़ गया है। पर्वत पर दत्तात्रेय का मंदिर और गोमुखी गंगा है, जो हिन्दुओं का तीर्थ है। जैनों का तीर्थ गजेंद्र पदकुंड भी पर्वत शिखर पर अवस्थित है।[1]

अभिलेख

गिरनार में कई इतिहास प्रसिद्ध अभिलेख मिले हैं। पहाड़ी की तलहटी में एक वृहत् चट्टान पर अशोक की मुख्य धर्मलिपियाँ 1-14 उत्कीर्ण हैं, जो ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में हैं। इसी चट्टान पर क्षत्रप रुद्रदामन का, लगभग 120 ई. में उत्कीर्ण, प्रसिद्ध संस्कृत अभिलेख है। इनमें पाटलिपुत्र के चंद्रगुप्त मौर्य तथा परवर्ती राजाओं द्वारा निर्मित तथा जीर्णोंद्धारित सुदर्शन झील और विष्णु मंदिर का सुंदर वर्णन है। यह लेख संस्कृत काव्य शैली के विकास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है। यह अभिलेख इस प्रकार है-

"सिद्धम्। इदं तडाकं सुदर्शनं गिरिनगरादपिदू-मृत्तिकोपलविस्तारायामोच्छयनि:संधिबद्धदृढ़सर्वपालीकत्वात् पर्वतपादप्रतिस्पर्धि सुश्लिष्टवंधं-मवजातेनाकृत्रिमेण सेतुबंधेनोपपन्नं सुप्रतिविहृत प्रणालीपरीबाहमीढ़विधानं च त्रिस्कंधं नादिभिरनुग्रहै महेत्युपचये वर्तते। तदिदं राज्ञो महाक्षत्रपस्य सुगृहीतनाम्न: स्वामिचष्टनपौत्रस्य राज्ञ: क्षत्रपस्य जयदान्न: पुत्रस्य राज्ञो महाक्षत्रपस्य गुरुभिरभ्यस्तनाम्नो रुद्रदाम्नोवर्षे द्विसप्ततितमे 702 मार्गशीर्ष बहुल प्रतिपदायां सृष्टवृष्टिना पर्जन्येनैकार्णवभूतायामिव पृथिव्यां कृतायां गिरेरूर्जयत: सुवर्णसिकतापलाशिनीप्रभृतीनां नदीनामति मात्रोदृवृत्तैर्वेगै: सेतुम-यमाणा-नुरूप प्रतिकारमपि-गिरशिखर तरुतटाट्टाल कोपतल्प द्वारशरणोच्छय विध्वंसिना युगनिवनसद्दशपरमघोरवेगेन वायुना प्रमथित सलिल विक्षिप्त जर्जरी कृताव क्षिप्ताश्म वृक्षगुल्म लताप्रतान मनदी तलादित्युद्धाटित मासीत्। चत्वारि हस्तशतानि विंशदुत्तराण्यायतेनैतावन्त्ये व विस्तीर्णने पंच सप्तहस्तानवगाढन भेदेन नि:सृत सर्व तीर्थ मरुधन्वकल्प मतिभृशं दुदर्शनं-स्यार्थे मौर्यस्य राज्ञ: चन्द्रगुप्तस्य राष्ट्रियेण वैश्येन पुष्पगुप्तेन कारितमशोकस्य मौर्यस्य कृते यवनराजेन तुषारस्फेनाधिष्टाय प्रणाली भिरलंकृत तत्कारितया च राजानुरूप कृतविधानया तस्मिन भेदे दृष्टया प्रणाड्या विस्तृत सेतुणा गर्भात् प्रभृत्यविहित समुदित राजलक्ष्मी धारणागुणत: सर्ववर्णेरभिगम्य रक्षणार्थ पतित्वे वृतेना प्राणोच्छवासात् पुरुषवध निवृति कृतसत्यप्रतिज्ञेनान्यत्र संग्रामेष्वभिमुखागत सदृश शत्रु प्रहरण वितरण त्वादिगुज रिपु-धृतकारुण्येन स्वयमभिगत जनपद प्रणिपतितायुष शरणदेन दस्युव्याल मृगरोगादिभिरनु पसृष्ट पूर्व नगरनिगम जनपदानां स्ववीर्यार्जितानामनुरक्त सर्वप्रकृतीनां पूर्वापराकरा वन्त्यनूपनी वृदानर्त सुराष्ट्र श्वभ्रभरुकच्छ सिंधु सौवीर कुकुरापरान्त निषादादीनां समग्रणां तत्प्रभावाद्य र्थ काम विषयाणां विषयाणां पतिना सर्वक्षत्राविष्कृतवीर शब्द जातोत्सेक विधेयानां यौयेयानां प्रसह्योत्सादकेन दक्षिणापथपते: सातकर्णे द्विरपि निर्व्याज मवजित्यावजित्य संबंधाबिदूरतयानुत्सादना त्प्राप्तयशसा माप्त विजयेन भ्रष्ट राजप्रतिष्ठापकेन यथार्थहस्तोच्छ्रयार्जितो-र्जितधर्मानुरागेण शब्दार्थ गांधर्वन्ययाद्यानां विद्यानां महतीनां पारण धारण विज्ञान प्रयोगावाप्त बिपुलकीर्तिना तुरग गज रथ चर्यासि चर्म नियुद्धाद्या परबल लाघवसौष्ठव क्रिपेणाहर हर्दानमाना नवमानशीलेन स्थूललक्षेण यथावत् प्राप्तैर्बलिशुल्क भागै: कनक रजतवज्र वडूर्य रत्नोपचय विष्यन्दमान कोशेन स्फुटलघु मधुर चित्रकान्त शब्द समयोहारालंकृत गद्यपद्य-न प्रमाणमानोन्मान स्वर गतिवर्ण सारस त्यादिभि: परमलक्षणं व्यंजनै रुपेतकान्तमूर्तिना स्वयमधिगत-महाक्षत्रप नाम्ना नरेन्द्र कन्या स्वयंवरानेक माल्यप्राप्त दाम्ना महाक्षत्रपेण रुद्रदाम्ना वर्ष सहस्त्राय गोव्राह्य-व धर्मकीर्ति वृद्धयर्थ चापीडयित्वा करविष्टि प्रणयक्रियाभि: पौरजनपदं जनं स्वस्मात्कोशान्महता धनौघेनानति महता च कालेन त्रिगुण दृढतर विस्तारायामं सेतुं विधाय सर्व तटे सुदर्शन वरं कारितम्। अस्मिन्नर्थे महाक्षत्रपस्य मति सचिवकर्म सचिवैरमात्य गुण समुद्युक्तैरप्यति महत्वाद् भेदस्यानुत्साह विमुख मतिभि: प्रत्याख्यातारंभं पुन: सेतुवंधनै राश्याद्धाहा भूतासु प्रजास्विहाघिष्ठाने पौरजानपदजनानुग्रहार्थ पार्थिवेन कृत्स्नानामानर्त सुराष्ट्राणां पालनार्थ नियुक्तेन पह्लवेन कुलैपपुत्रेणामात्येन सुविशाखेन यथावदर्थधर्म व्यवहार दर्शनैरनुरागम बिवर्धयता शक्तेन दान्तेना चपला विस्मितेनार्येणाहर्येण स्वधितिष्ठता धर्मकीर्ति यशांसि भर्तुरभिवर्धयतानुष्ठितामिति।"[1]

स्कंदगुप्त का अभिलेख

इसी अभिलेख की चट्टान पर 458 ई. का गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के समय का भी एक अभिलेख अंकित है। इसमें स्कंदगुप्त द्वारा नियुक्त सुराष्ट्र के तत्कालीनराष्ट्रिक पर्णदत्त का उल्लेख है। पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने जो गिरिनगर का शासक था, सुदर्शन तड़ाग के सेतु या बांध का जीर्णोद्धार करवाया, क्योंकि यह स्कंदगुप्त के राज्याभिषेक के वर्ष में जल के वेग से नष्ट हो गया था। इन अभिलेखों से प्रमाणित होता है कि हमारे इतिहास के सुदूर अतीत में भी राज्य द्वारा नदियों पर बांध बनाकर किसानों के लिए कृषि एवं सिंचाई के साधन जुटाने को दीर्घकालीन प्रथा थी। जैन ग्रंथ विविधतीर्थकल्प में वर्णित है कि गिरनार सब पर्वतों में श्रेष्ठ है, क्योंकि यह तीर्थंकर नेमिनाथ से सम्बंधित है।[1]

रुद्रदामन के जूनागढ़ लेख से ज्ञात होता है कि सम्राट अशोक के समय तुशाष्प नामक अधीनस्थ यवन राज्यपाल के रूप में सौराष्ट्र पर शासन करता था। गिरनार की एक पहाड़ी की तलहटी में अशोक के शिलालेख (तीसरी शताब्दी ई. पू.) से युक्त एक चट्टान है। मौर्य शासक चंद्रगुप्त (चौथी शताब्दी ई. पू. का उत्तरार्ध) द्वारा सुदर्शन नामक झील बनाए जाने का उल्लेख भी इसी शिलालेख में मिलता है। इन दो महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाणों के आस-पास की पहाड़ियों पर सोलंकी वंश (961-1242) के राजाओं द्वारा बनवाए गए कई जैन मंदिर स्थित हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 285 |

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