चंद्रगुप्त मौर्य  

(चन्द्रगुप्त मौर्य से पुनर्निर्देशित)


चंद्रगुप्त मौर्य
Chandragupt-Maurya-Stamp.jpg
पूरा नाम चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य
जन्म 340 ई. पू.
जन्म भूमि मगध, भारत
मृत्यु तिथि 298 ई पू (42 वर्ष में)
मृत्यु स्थान श्रवण बेल्गोला, कर्नाटक
पिता/माता "मुरा या मोरा" (माता)
संतान बिन्दुसार
उपाधि सम्राट
राज्य सीमा सम्पूर्ण भारत (लगभग)
शासन काल 322 से 298 ई. पू.
शा. अवधि 24 वर्ष (लगभग)
राज्याभिषेक 322 ई.पू.
धार्मिक मान्यता वैदिक और जैन
प्रसिद्धि भारत का प्रथम 'ऐतिहासिक सम्राट'
राजधानी पाटलिपुत्र
पूर्वाधिकारी धनानंद
वंश मौर्य वंश
संबंधित लेख चाणक्य . अशोक
Disamb2.jpg चंद्रगुप्त एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- चंद्रगुप्त (बहुविकल्पी)

चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य (शासनकाल: 322 से 298 ई. पू.तक) की गणना भारत के महानतम शासकों में की जाती है। उसकी महानता की सूचक अनेक उपाधियाँ हैं और उसकी महानता कई बातों में अद्वितीय भी है। वह भारत के प्रथम ‘ऐतिहासिक’ सम्राट के रूप में हमारे सामने आता है, इस अर्थ में कि वह भारतीय इतिहास का पहला सम्राट है जिसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित कालक्रम के ठोस आधार पर सिद्ध की जा सकती है।[1]

आरम्भिक जीवन

चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के बारे में जानकारी हमें बौद्ध कथाओं से प्राप्त होती है। इन कथाओं का स्रोत मुख्यत: दो रचनाओं में मिलता है:

  1. महावंस टीका, जिसे वंसत्थप्पकासिनी भी कहते हैं (जिसकी रचना लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के मध्य हुई थी) और
  2. महाबोधिवंस, जिसके रचयिता उपतिस्स हैं (लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के उत्तरार्ध में)।

इन दोनों ही ग्रन्थों का आधार, सीहलट्ठकथा तथा उत्तरविहारट्ठकथा नामक प्राचीन ग्रन्थ हैं। सीहलट्ठकथा के बारे में कहा जाता है कि उसकी रचना थेर महिंद (अशोक का पुत्र) तथा उनके साथ मगध से आए हुए अन्य भिक्षुओं ने की थी, जिन्हें संघ के प्रधान ने धर्मप्रचार के लिए लंका भेजा था।[2]

जन्म और वंश

इस संबंध में विभिन्न मत हैं:-

  • चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है। चंद्रगुप्त के वंश के समान उसके आरम्भिक जीवन के पुनर्गठन का भी आधार किंवदंतियाँ एवं परम्पराएँ ही अधिक हैं और ठोस प्रमाण कम हैं। इस सम्बन्ध में चाणक्य चंद्रगुप्त कथा का सारांश उल्लेखनीय है। जिसके अनुसार नंद वंश द्वारा अपमानित किए जाने पर चाणक्य ने उसे समूल नष्ट करने का प्रण किया। संयोगवश उसकी भेंट चंद्रगुप्त से हो गई और वह उसे तक्षशिला ले गया।[3]
  • धुंढिराज[4] के मतानुसार चंद्रगुप्त का पिता मौर्य था और सर्वार्थसिद्धि ने अपना सेनापति अपने नंद पुत्रों को न बनाकर मौर्य को बनाया था, इस पर नंद बंधुओं ने छल से मौर्य तथा उसके सब पत्रों को मरवा दिया, केवल चंद्रगुप्त भाग निकला। नंदों का एक दूसरा शत्रु चाणक्य भी था। समान शत्रुता के कारण ये दोनों मित्र बन गए।
  • मौर्यवंश का संस्थापक। उसके माता-पिता के नाम ठीक-ठीक ज्ञात नहीं हैं। पुराणों के अनुसार वह मगध के राजा नन्द का उपपुत्र था, जिसका जन्म मुरा नामक शूद्रा दासी से हुआ था। बौद्ध और जैन सूत्रों से पता चलता है। कि चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म पिप्पलिवन के मोरिय क्षत्रिय कुल में हुआ था। जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था।[5]
  • विशाखदत्त के नाटक 'मुद्राराक्षस' में चंद्रगुप्त को नंदपुत्र न कहकर मौर्यपुत्र कहा गया है। फिर भी उसे ‘नंदवंश की सन्तान’ कहा गया है, क्योंकि वह सर्वार्थसिद्धि के पुत्र मौर्य का बेटा था और सर्वार्थसिद्धि नौ नंदों का पिता था और स्वंय नंदवंश की सन्तान था। इस बूढ़े राजा को भी नंद कहा गया है। नाटक में दिखाया गया है कि राक्षस के परामर्श से वह पाटलिपुत्र छोड़कर वन में भाग गया था क्योंकि चंद्रगुप्त तथा चाणक्य ने एक-एक करके उसके सभी पुत्रों (नौ नंदों को) मरवा डाला था। फिर भी चंद्रगुप्त को अपने पिता का हत्यारा नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसे कहीं नंदपुत्र नहीं कहा गया है। वह उन नौ नंदों में से किसी की भी सन्तान नहीं था। उसके लिए जिस दूसरे शब्द ‘मौर्यपुत्र’ का प्रयोग किया गया, उसके कारण वह इस जघन्य अपराध के दोष से मुक्त हो गया है[6][7]
  • वृत्तांतों के अनुसार चंद्रगुप्त का जन्म मोरिय नामक क्षत्रिय जाति में हुआ था जिनका शाक्यों के साथ सम्बन्ध था। अपनी जन्मभूमि छोड़कर चली आने वाली मोरिय जाति का मुखिया चंद्रगुप्त का पिता था। दुर्भाग्यवश वह सीमांत पर एक झगड़े में मारा गया और उसका परिवार अनाथ रह गया। उसकी अबला विधवा अपने भाइयों के साथ भागकर पुष्यपुर (कुसुमपुर पाटलिपुत्र) नामक नगर में पहुँची, जहाँ उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। सुरक्षा के विचार से इस अनाथ बालक को उसके मामाओं ने एक गोशाला में छोड़ दिया, जहाँ एक गड़रिए ने अपने पुत्र की तरह उसका लालन-पालन किया और जब वह बड़ा हुआ तो उसे एक शिकारी के हाथ बेच दिया, जिसने उसे गाय-भैंस चराने के काम पर लगा दिया। कहा जाता है कि एक साधारण ग्रामीण बालक चंद्रगुप्त ने राजकीलम नामक एक खेल का आविष्कार करके जन्मजात नेता होने का परिचय दिया। इस खेल में वह राजा बनता था और अपने साथियों को अपना अनुचर बनाता था। वह राजसभा भी आयोजित करता था जिसमें बैठकर वह न्याय करता था। गाँव के बच्चों की एक ऐसी ही राजसभा में चाणक्य ने पहली बार चंद्रगुप्त को देखा था।[8]
  • कुछ लोग चंद्रगुप्त को मुरा नाम की शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नंद सम्राट की संतान बताते हैं पर बौद्ध और जैन साहित्य के अनुसार यह मौर्य (मोरिय) कुल में जन्मा था और नंद राजाओं का महत्त्वाकांक्षी सेनापति था। चंद्रगुप्त के वंश और जाति के सम्बन्ध में विद्वान् एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण ग्रंथों, मुद्राराक्षस, विष्णुपुराण की मध्यकालीन टीका तथा 10वीं शताब्दी की धुण्डिराज द्वारा रचित मुद्राराक्षस की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को शूद्र माना है। चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।[9]
  • बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’ के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है। चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है।
    एक और कहानी भी है जिसमें मोरिय नगर नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। इस शहर का नाम मोरिय नगर इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं। जिन लोगों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे मोरिय कहलाए। महाबोधिवंस [10] में कहा गया है कि ‘कुमार’ चंद्रगुप्त, जिसका जन्म राजाओं के कुल में हुआ था (नरिंद-कुलसंभव), जो मोरिय नगर का निवासी था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था, चाणक्य नामक ब्राह्मण (द्विज) की सहायता से पाटलिपुत्र का राजा बना।
    महाबोधिवंस में यह भी कहा गया है कि ‘चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में’ हुआ था (मोरियनं खत्तियनं वंसे जातं)। बौद्धों के दीघ निकाय नामक ग्रन्थ में[11] पिप्पलिवन में रहने वाले मोरिय नामक एक क्षत्रिय वंश का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान[12]में बिन्दुसार (चंद्रगुप्त के पुत्र) के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को क्षत्रिय कहा गया है।[13]
  • एक मत कथासरित्सागर में उपलब्ध होता है। इसके अनुसार चंद्रगुप्त नन्द राजा का ही पुत्र था, और उसके अन्य कोई सन्तान नहीं थी।
  • चंद्रगुप्त के विषय में महावंश में पाये मतानुसार अनुसार चंद्रगुप्त पिप्पलिवन के मोरिय गण का कुमार था। नन्द के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। मोरिय गण वज्जि-महाजनपद के पड़ोस में स्थित था। उत्तरी बिहार के सब गणराज्य कौशल और मगध के साम्राज्यवाद के शिकार हो गए थे, और मोरिय गण भी मगध की अधीनता में आ गया था। इस गण की एक राजमहिषी पाटलिपुत्र में छिपकर जीवन व्यतीत कर रही थी। वहीं पर उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। चंद्रगुप्त कहीं मगध के राजकर्मचारियों के हाथों में न पड़ जाए, इसलिए उसने अपने नवजात शिशु को ग्वाले के सुपुर्द कर दिया। अपनी आयु के अन्य ग्वाल-बालकों के साथ मोरिय चंद्रगुप्त का भी पालन होने लगा।

चंद्रगुप्त और चाणक्य की भेंट

चाणक्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से तुरन्त इस ग्रामीण अनाथ बालक में राजत्व की प्रतिभा तथा चिह्न देखे और वहीं पर 1,000 कार्षापण देकर उसे उसके पालक-पिता से ख़रीद लिया। उस समय चंद्रगुप्त आठ या नौ वर्ष का बालक रहा होगा। चाणक्य जिसे तक्षशिला नामक नगर का निवासी (तक्कसिलानगर-वासी) बताया गया है, बालक को लेकर अपने नगर लौटा और 7 या 8 वर्ष तक उस प्रख्यात विद्यापीठ में उसे शिक्षा दिलाई, जहाँ जातककथाओं के अनुसार, उस समय की समस्त ‘विधाएँ तथा कलाएँ’ सिखाई जाती थीं। वहाँ चाणक्य ने उसे अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की भी सर्वांगीण शिक्षा दिलाई[14][15]

पालि स्रोतों से प्राप्त चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के इस विवरण से जस्टिन के इस कथन की भी पुष्टि होती है कि उसका जन्म एक मामूली घराने में हुआ था।[16]

मगध के राजा जाति-नियमों को वैसे ही विशेष महत्त्व नहीं देते थे; मौर्य तो आदिवासी मूल अथवा मिश्रित वंश के थे, यद्यपि उनका आर्यीकरण हो चुका था। मौर्य (पालि: मोरिय) नाम मोर टोटेम का सूचक है, यह वैदिक-आर्य नाम नहीं हो सकता।[17]

जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था। जब वह किशोर ही था, उसने पंजाब में पड़ाव डाले हुए यवन (यूनानी) विजेता सिकंदर से भेंट की। उसने अपनी स्पष्टवादिता से सिकंदर को नाराज़ कर दिया। सिकंदर ने उसे बंदी बना लेने का आदेश दिया, लेकिन वह अपने शौर्य का प्रदर्शन करता हुआ सिकंदर के शिकंजे से भाग निकला और कहा जाता है। कि इसके बाद ही उसकी भेंट तक्षशिला के एक आचार्य चाणक्य या कौटिल्य-से हुई।[18]

चंद्रगुप्त की शिक्षा

जातककथाओं से हमें पता चलता है कि उस समय के राजा अपने राजकुमारों को विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला भेजा करते थे, जहाँ विश्व-विख्यात अध्यापक थे। इन कथाओं में हम पढ़ते हैं : "सारे भारत से क्षत्रियों तथा ब्राह्मणों के पुत्र इन अध्यापकों से विभिन्न कलाएँ सीखने आते थे।" तक्षशिला प्राथमिक शिक्षा का ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा का केन्द्र भी था। इस बात का उल्लेख मिलता है कि वहाँ बालकों को 16 वर्ष की अवस्था में अर्थात् ‘किशोरावस्था में प्रवेश करने पर’ भरती किया जाता था। इससे बड़ी अवस्था के छात्र अथवा गृहस्थ लोग भी यहाँ शिक्षा प्राप्त करते थे। वे अपने रहने आदि का प्रबंध स्वंय करते थे। हमें तक्षशिला के एक ऐसे अध्यापक का भी उल्लेख मिलता है, जिसकी पाठशाला में केवल राजकुमार ही पढ़ते थे, "उस समय भारत में इन राजकुमारों की संख्या 101 थी।" वहीं जिन विषयों की शिक्षा दी जाती थी, उनमें तीन वेदों तथा 18 ‘सिप्पों’ अर्थात् शिल्पों का उल्लेख मिलता है, जिनमें धनुर्विद्या (इस्सत्थ-सिप्प), आखेट तथा हाथियों से सम्बन्धित ज्ञान (हत्थिसुत्त) का उल्लेख किया गया है, जिन्हें राजकुमारों के लिए उपयुक्त समझा जाता था। सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों ही की शिक्षा दी जाती थी।

तक्षशिला अपनी विधिशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान तथा सैन्यविद्या की अलग-अलग पाठशालाओं के लिए प्रख्यात था। तक्षशिला की सैनिक अकादमी का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें 103 राजकुमार शिक्षा पाते थे। एक जगह पर यह विवरण मिलता है कि किस प्रकार एक शिष्य को सैन्यविद्या की शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद उसके गुरु ने प्रमाणपत्र के रूप में स्वंय अपनी "तलवार, एक धनुष और बाण, एक कवच तथा एक हीरा" दिया और उससे कहा कि वह उसके स्थान पर सैन्यविद्या की शिक्षा प्राप्त करने वाले 500 शिष्यों की पाठशाला के प्रधान का पद ग्रहण करे, क्योंकि वह वृद्ध हो गया है और अवकाश ग्रहण करना चाहता है[19]। चाणक्य अपने अल्पवयस्क शिष्य की शिक्षा का इससे अच्छा कोई दूसरा प्रबंध नहीं कर सकता था कि उसे विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला में भरती करा दे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 13 |
  2. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 30 |
  3. प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक: द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |प्रकाशक: दिल्ली विश्वविद्यालय |पृष्ठ संख्या: 174-175 |
  4. विशाखदत्त के प्रसिद्ध नाटक मुद्राराक्षस का टीकाकार
  5. भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानंद भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 143-144 |
  6. सी.डी. चटर्जी | इंडियन कल्चर में आब्ज़र्वेशंस ऑन दि बृहत्कथा | खंड 1- पृष्ठ 221
  7. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 26 |
  8. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 30 |
  9. प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक: द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |प्रकाशक: दिल्ली विश्वविद्यालय |पृष्ठ संख्या: 174 |
  10. सम्पादक: स्ट्रांग, पृष्ठ 98
  11. दीघ निकाय 2,167
  12. सम्पादक: कावेल, पृष्ठ 370
  13. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 28 |
  14. बहुसच्चाभावंच; उग्गहितसिप्पकंच
  15. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 30 |
  16. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 32 |
  17. प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता |लेखक: दामोदर धर्मानंद कोसंबी |अनुवादक: गुणाकर मुले |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 174 |
  18. भारतीय इतिहास कोश |लेखक: सच्चिदानंद भट्टाचार्य |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 143 |
  19. विस्तृत विवरण के लिए राधाकुमुद मुखर्जी की "ऐन्शेंट इंडियन एजुकेशन", मैकमिलंस, लंदन, नामक रचना का 19वाँ अध्याय देखिए।
  20. वुड्ढपटिपाटिया
  21. मुद्राराक्षस में मलय का उल्लेख मिलता है
  22. रज्जम वा देंतु युद्धं वा
  23. सिंहली भाषा में महावंस टीका का मूलपाठ, जो श्री सी.डी. चटर्जी ने श्री राधाकुमुद मुखर्जी को पढ़कर बताया [भारतकोश टिप्पणी]
  24. महावंस टीका
  25. महावंस टीका
  26. ऐय्यंगर कृत-बिगिनिंग्स ऑफ़ साउथ इंडियन हिस्ट्री, पृष्ठ 89
  27. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 36 |
  28. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 40 |
  29. Plutarch: Life of Alexander (अंग्रेज़ी) (एच टी एम एल) penelope.uchicago.edu। अभिगमन तिथि: 18 अक्टूबर, 2011।
  30. महावंश टीका, पृष्ठ.123, परिशिष्ट1
  31. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 51 |
  32. VIII, 253-54
  33. कैंब्रिज हिस्ट्री, पृ.435
  34. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 53 |
  35. 'एंड्रोकोट्टस' और 'सैंड्रोकोट्टस' दोनों चन्द्रगुप्त के ही नाम हैं जो यूनानी ग्रंथों में पाये जाते हैं।
  36. लाइव्स, अध्याय 42
  37. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 54 |
  38. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 174 |
  39. वारमिंगटन. कामर्स बिटविन रोमन एंपायर ऐंड इंडिया, पृष्ठ 151
  40. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 55 |
  41. भारत का इतिहास |लेखक: रोमिला थापर |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 62 |
  42. चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक: राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 174 |
  43. भारत का इतिहास |लेखक: रोमिला थापर |प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या: 62 |

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