कंचनजंघा  

कंचनजंघा

कंचनजंगा सिक्किम-नेपाल सीमा पर 28,146 फुट ऊँचा, गौरीशंकर (एवरेस्ट) पर्वत के बाद विश्व का दूसरा सर्वोच्च पर्वत शिखर है। इस पर्वत की भूगर्भीय स्थिति हिमालय की मुख्य श्रेणी के सदृश है। यह तिब्बत एवं भारत की जल विभाजक रेखा के दक्षिण में स्थित है। इसीलिए इसकी उत्तरी ढाल की नदियाँ भी भारतीय मैदान में गिरती हैं। कंचनजंगा तिब्बती शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'महान हिमानियों के पाँच अतिक्रमण' है, जो इसकी पाँच चोटियों से संबंधित है। इसका दूसरा नाम 'कोंगलोचु' है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'बर्फ़ का सर्वोच्च पर्दा' है।[1]

नामकरण

'कंचनजंघा' नाम की उत्पत्ति तिब्बती मूल के चार शब्दों से हुई है, जिन्हें आमतौर पर 'कांग-छेन्-द्जो-न्गा' या 'यांग-छेन-द्जो-न्गा' लिखा जाता है। सिक्किम में इसका अर्थ 'विशाल हिम की पाँच निधियाँ' लगाया जाता है। कंचनजंघा नेपाली में 'कुंभकरण लंगूर' कहलाता है। यह विश्व का दूसरा सबसे ऊँचा पहाड़ (8,586 मीटर) है।

स्थिति

यह पर्वत दार्जिलिंग से 74 किलोमीटर उत्तर-पश्चिमोत्तर में स्थित है। कंचनजंघा सिक्किम व नेपाल की सीमा को छूने वाले भारतीय प्रदेश में हिमालय पर्वतश्रेणी का एक हिस्सा है। इसका आकार एक विशालकाय सलीब के रूप में है, जिसकी भुजाएँ उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में स्थित हैं। अलग-अलग खड़े शिखर अपने निकटवर्ती शिखर से चार मुख्य पर्वतीय कटकों के द्वारा जुड़े हुए हैं, जिनसे होकर चार हिमनद बहते हैं-

  1. जेमु (पूर्वोत्तर)
  2. तालुंग (दक्षिण-पूर्व)
  3. यालुंग (दक्षिण-पश्चिम)
  4. कंचनजंघा (पश्चिमोत्तर)

पौराणिक कथाओं और स्थानीय निवासियों के धार्मिक अनुष्ठानों में इस पर्वत का महत्त्वपूर्ण स्थान है और इसकी ढलान किसी प्राथमिक सर्वेक्षण से सदियों पहले चरवाहों और व्यापारियों के लिए जानी-पहचानी थी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कंचनजंगा (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 25 मार्च, 2014।

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