वृन्दावन  

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वृन्दावन
केशी घाट वृन्दावन
विवरण मथुरा में स्थित वृन्दावन को भगवान श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का स्थान माना जाता है। वृन्दावन को 'ब्रज का हृदय' कहते हैं।
राज्य उत्तर प्रदेश
ज़िला मथुरा
मार्ग स्थिति मथुरा से 12 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में यमुना तट पर स्थित है।
रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन
बस अड्डा नया बस अड्डा, मथुरा
यातायात बस, कार, ऑटो आदि
क्या देखें गोविन्द देव मन्दिर, मदन मोहन मन्दिर, रंगजी मन्दिर, बांके बिहारी मन्दिर, रथयात्रा, इस्कॉन मन्दिर
ए.टी.एम लगभग सभी
सावधानी बंदरों से सावधान रहें।
संबंधित लेख निधिवन, सेवाकुंज, चीर घाट, केशी घाट, इमलीतला घाट, रासलीला
अन्य जानकारी ब्रज के केन्द्र में स्थित वृन्दावन में सैंकड़ों मन्दिर हैं, जिनमें से अनेक ऐतिहासिक धरोहर भी है। यहाँ सैंकड़ों आश्रम और कई गौशालाऐं हैं। चैतन्य, वैष्णव और हिन्दुओं के धार्मिक क्रिया-कलापों के लिए वृन्दावन विश्वभर में प्रसिद्ध है।

वृन्दावन (अंग्रेज़ी: Vrindavan) मथुरा से 12 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम में यमुना तट पर स्थित है। यह कृष्ण की लीलास्थली है। हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण आदि में वृन्दावन की महिमा का वर्णन किया गया है। कालिदास ने इसका उल्लेख रघुवंश में इंदुमती-स्वयंवर के प्रसंग में शूरसेनाधिपति सुषेण का परिचय देते हुए किया है।[1] इससे कालिदास के समय में वृन्दावन के मनोहारी उद्यानों की स्थिति का ज्ञान होता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार गोकुल से कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंद जी कुटुंबियों और सजातियों के साथ वृन्दावन निवास के लिए आये थे।[2] विष्णु पुराण में इसी प्रसंग का उल्लेख है।[3] विष्णुपुराण में अन्यत्र वृन्दावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी है।[4] आदि।

प्राचीन वृन्दावन

कहते है कि वर्तमान वृन्दावन असली या प्राचीन वृन्दावन नहीं है। श्रीमद्भागवत[5] के वर्णन तथा अन्य उल्लेखों से जान पड़ता है कि प्राचीन वृन्दावन गोवर्धन के निकट था। गोवर्धन-धारण की प्रसिद्ध कथा की स्थली वृन्दावन पारसौली (परम रासस्थली) के निकट था। अष्टछाप कवि सूरदास इसी ग्राम में दीर्घकाल तक रहे थे। सूरदास जी ने वृन्दावन रज की महिमा के वशीभूत होकर गाया है-

हम ना भई वृन्दावन रेणु, हम ना भई वृन्दावन रेणु।

तिन चरनन डोलत नंद नन्दन नित प्रति चरावत धेनु।
हम ते धन्य परम ये द्रुम वन बाल बच्छ अरु धेनु।

सूर सकल खेलत हँस बोलत संग मध्य पीवत धेनु॥ -सूरदास

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'संभाव्य भर्तारममुंयुवानंमृदुप्रवालोत्तरपुष्पशय्ये, वृन्दावने चैत्ररथादनूनं निर्विशयतां संदरि यौवनश्री' रघुवंश 6,50
  2. वनं वृन्दावनं नाम पशव्यं नवकाननं गोपगोपीगवां सेव्य पुण्याद्रितृणवीरूधम्।
    तत्तत्राद्यैव यास्याम: शकटान्युड्क्तमाचिरम् , गोधनान्यग्रतो यान्तु भवतां यदि रोचते।
    वृन्दावन सम्प्रविष्य सर्वकालसुखावहम्, तत्र चकु: व्रजावासं शकटैरर्धचन्द्रवत्।
    वृंदावन गोवर्धनं यमुनापुलिनानि च, वीक्ष्यासीदुत्तमाप्रीती राममाधवयोर्नृप' श्रीमद्भागवत, 10,11,28-29-35-36 ।
  3. 'वृन्दावन भगवता कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा शुभेण मनसाध्यातं गवां सिद्विमभीप्सता। 'विष्णुपुराण 5,6,28
  4. 'यथा एकदा तु विना रामं कृष्णो वृन्दावन ययु:' दे. विष्णुपुराण 5,13,24
  5. श्रीमद्भागवत 10,36
  6. वनं वृन्दावनं नाम पशव्यं नवकाननम्। गोपगोपीगवां सेव्यं पुण्याद्रितृणवीरूधम् ॥ (श्रीमद्भभागवत 10/11/28
  7. तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाड्घ्रिरजोऽभिषेकम्।
    चज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द-स्त्वद्यापि यत्पदरज: श्रुतिमृग्यमेव ॥(श्रीमद्भभागवत 10/14/34)
  8. आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
    या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम् ॥ (श्रीमद्भभागवत 10/47/61)
  9. पुण्या बत ब्रजभुवो यदयं नृलिंग- गूढ: पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्य:।
    गा: पालयन् सहबल: क्वणयंश्चवेणुं विक्रीड़यांचति गिरित्ररमार्चिताड्घ्रि: ॥ (श्रीमद्भभागवत 10/44/13)
  10. वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्ति यद्देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि।
    गोविन्दवेणुमनुमत्तमयूरनृत्यं प्रेक्ष्याद्रिसान्वपरतान्यसमस्तसत्वम् ॥ (श्रीमद्भभागवत 10/21/10)
  11. बर्हापीडं नटवरपु: कर्णयो: कर्णिकारं बिभ्रद् वास: कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।
    रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैर्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्ति: ॥(श्रीमद्भभागवत 10/21/5)
  12. वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति' (ब्रह्मयामल

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