दुग्धेश्वरनाथ  

दुग्धेश्वरनाथ भगवान शिव को समर्पित प्राचीन मन्दिर है। यह मन्दिर उत्तर प्रदेश में देवरिया ज़िले के रुद्रपुर क़स्बे के पास स्थित है। यहाँ जो शिवलिंग है, वह 'महाकाल' का उपलिंग माना जाता है। यह स्थान बहुत प्राचीन है। नगर और दुर्ग के विस्तृत अवशेष तथा वैष्णव, शैव, जैन एवं बौद्ध मूर्तियाँ यहाँ पाई जाती हैं। इनकी चर्चा चीनी यात्री फ़ाह्यान ने भी है। पहले यहाँ पंचकोसी परिक्रमा होती थी, जिसमें अनेक तीर्थ पड़ते थे। शिवरात्रि तथा अधिक मास में यहाँ मेला लगता है। मुख्य मन्दिर के आसपास अनेक नवीन मन्दिर हैं।[1]

विशेषताएँ

भारत में वैसे तो अनेकानेक शिवालय हैं, परन्तु देवरिया में 11वीं सदी के अष्टकोण में बने प्रसिद्ध 'दुग्धेश्वरनाथ मंदिर' में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। इस शिवलिंग का आधार कहाँ तक है, इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है। सबसे बड़ी बात है कि यहाँ लिंग को किसी मनुष्य ने नहीं बनाया, बल्कि यह स्वयं धरती से निकला है।[2]

निर्माणकाल

मंदिर के संबंध में जानकारी रखने वाले बताते हैं कि ग्यारहवीं सदी में इस मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरीसिंह ने करवाया था, जिनका संभवत: सत्तासी कोस में साम्राज्य स्थापित था। यह भी कहा जाता है कि यह मंदिर ईसा पूर्व के ही समय से यहाँ है। पुरातत्त्व विभाग के पटना कार्यालय में भी 'नाथबाबा' के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर के संबंध में उल्लेख मिलता है। मंदिर के बारे में पुजारी ने बताया कि यह काशी के ही क्षेत्र में आता है और शिवपुराण में इसका वर्णन है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन की भांति इसे पौराणिक महत्ता प्रदान की गई है। यह उनका उपलिंग है।

मेले का आयोजन

ज़िला मुख्यालय से क़रीब 22 कि.मी. पश्चिम दिशा में स्थित 'दूसरी काशी' के नाम से प्रसिद्ध अष्टकोण में बना बाबा दुग्धेश्वरनाथ के विशाल मंदिर में वैसे तो पूरे साल भक्त एवं श्रद्धालु आते हैं, लेकिन श्रावण मास में शिव के भक्तों द्वारा सरयू नदी से कांवड़ से जल चढ़ाने की पुरातन परम्परा आज भी विद्यमान है। महाशिवरात्रि के दिन एवं श्रावण मास में यहाँ भारी भीड़ होती है। इन दिनों में यहाँ पर एक विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें भाग लेने के लिए दूर-दूर से लोगों की भीड़ यहाँ आती है। उस समय यहाँ चारों ओर सिर्फ़ शिव की भक्तिधारा ही दिखाई देती है। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव, ओम नम: शिवाय और बाबा भोलेनाथ की जयकारों से गुंजायमान रहता है।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दू धर्मकोश |लेखक: डॉ. राजबली पाण्डेय |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 322 |
  2. 2.0 2.1 2.2 रुद्रपुर का शिवलिंग (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल.)। । अभिगमन तिथि: 07 मार्च, 2012।

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