अधिक मास  

अधिक मास
पुस्तक 'अधिकमास माहत्म्य'
विवरण 'अधिक मास' का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व माना गया है। भारत में खगोलीय गणना के अनुसार प्रत्येक तीसरे वर्ष एक अधिक मास होता है।
अन्य नाम 'अधिमास', 'मलमास', 'मलिम्लुच', 'संसर्प', 'अंहस्पति' या 'अंहसस्पति', 'पुरुषोत्तममास'।
क्या करें इस माह में व्रत, दान, पूजा, हवन, ध्यान आदि करने से पाप कर्म समाप्त हो जाते हैं और किए गए पुण्यों का फल कई गुणा प्राप्त होता है।
विशेष 'मलमास' या 'अधिक मास' का कोई स्वामी नहीं होता, अत: इस माह में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य, शुभ एवं पितृकार्य वर्जित माने गए हैं।
अन्य जानकारी देवी भागवत पुराण के अनुसार 'मलमास' में किए गये सभी शुभ कर्मो का अनंत गुना फल प्राप्त होता है। इस माह में 'भागवत' कथा श्रवण की भी विशेष महत्ता है। अधिक मास में तीर्थ स्थलों पर स्नान का भी महत्त्व है।

पुरुषोत्तम, मल या अधिक मास
भारतीय पंचांग (खगोलीय गणना) के अनुसार प्रत्येक तीसरे वर्ष एक अधिक मास होता है। यह सौर और चंद्र मास को एक समान लाने की गणितीय प्रक्रिया है। शास्त्रों के अनुसार पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप, दान से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है। सूर्य की बारह संक्रांति होती हैं और इसी आधार पर हमारे चंद्र पर आधारित 12 माह होते हैं। हर तीन वर्ष के अंतराल पर अधिक मास या मलमास आता है। शास्त्रानुसार-

यस्मिन चांद्रे न संक्रान्ति: सो अधिमासो निगह्यते
तत्र मंगल कार्यानि नैव कुर्यात कदाचन्।
यस्मिन मासे द्वि संक्रान्ति क्षय: मास: स कथ्यते
तस्मिन शुभाणि कार्याणि यत्नत: परिवर्जयेत।।

अधिक मास क्या है?

  • जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती वह अधिक मास होता है। इसी प्रकार जिस माह में दो सूर्य संक्रांति होती है वह क्षय मास कहलाता है।
  • इन दोनों ही मासों में मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, परंतु धर्म-कर्म के कार्य पुण्य फलदायी होते हैं। सौर वर्ष 365.2422 दिन का होता है जबकि चंद्र वर्ष 354.327 दिन का होता है। इस तरह दोनों के कैलेंडर वर्ष में 10.87 दिन का फ़र्क़ आ जाता है और तीन वर्ष में यह अंतर 1 माह का हो जाता है। इस असमानता को दूर करने के लिए अधिक मास एवं क्षय मास का नियम बनाया गया है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऐतरेय ब्राह्मण 3|1
  2. तैतरीय संहिता 1|4|4|1 एवं 6|5|3|4
  3. अथर्ववेद 8|6|2
  4. काठसंहिता 38|14
  5. ऋग्वेद 10|136|2, वाजसनेयी संहिता (22|30), शांखायन श्रौतसूत्र (6|12|15
  6. मलमासतत्त्व पृ0 768
  7. वाजसनेयी संहिता 22|30 एवं 31
  8. वाजसनेयी संहिता 7|31
  9. तैतरीय संहिता (1|4|14|1 एवं 6|5|3|4
  10. पद्म पुराण, 6|64
  11. अग्नि पुराण 175|29-30
  12. हेमाद्रि, काल, पृ0 36-63
  13. निर्णयसिन्धु (पृ0 10-15) एवं धर्मसिन्धु (पृ0 5-7
  14. काम्यारम्भं तत्समाप्तिं विवर्जयेत्।
    आरब्धं मलमासात् प्राक् कृच्छ्रं चान्द्रादिकं तु यत्।
    तत्समाप्यं सावनस्य मानस्यानतिलंघनात्।।
    आरम्भस्य समाप्तेश्च मध्ये स्याच्चेन्मलिम्लुचः।
    प्रवृत्तमखिलं काम्यं तदानुष्ठेयमेव तु।।
    कारीर्यादि तु यत्काम्यं तस्यारम्भसमापने कार्यकालविलम्बस्य प्रतीक्षाया असम्भवात्।।
    अनन्यगतिकं नित्यमग्निहोत्रादि न त्यजेत्।
    गत्यन्तरयुतं नित्यं सोमयागादि वर्जयेत्।। - कालनिर्णय-कारिका (21-24)।

  15. हेमाद्रि, काल, पृ0 52; समय प्रकाश, पृ0 145
  16. वा.सं. 7/30, 22/31 तै. सं. 1/4/14, 5/6/7, तै.व्रा. 3/8/3
  17. तैतरीय ब्राह्मण 1/1/2/6,7
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