मागधी भाषा  

(मागधी से पुनर्निर्देशित)


मागधी या मगही भारत की एक भाषा है। मगही शब्द का विकास मागधी से हुआ है (मागधी > मागही >मगही)। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की भाषा थी। भगवान बुद्ध अपने उपदेश इसके प्राचीन रुप मागधी प्राकृत में ही देते थे। मगही का मैथिली और भोजपुरी भाषाओं से भी गहरा संबंध है जिन्हें सामूहिक रूप से बिहारी भाषाएं कहा जाता है जो इन्डो-आर्यन भाषाएं हैं। मैथिली की पारंपरिक लिपि “कैथी” है पर अब यह सामन्यतः देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है। मगही बिहार के मुख्यतः पटना, गया, जहानाबाद, और औरंगाबाद ज़िले में बोली जाती है। इसके अलावा यह पलामू, गिरिडीह, हज़ारीबाग, मुंगेर, और भागलपुर, झारखंड के कुछ ज़िलों तथा पश्चिम बंगाल के मालदा में भी बोली जाती है।

आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है; अतः स्थान भेद के साथ-साथ इसके रूप बदल जाते हैं। प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है। मगही भाषा के निम्नलिखित भेदों का संकेत भाषाविद कृष्णदेव प्रसाद ने किया है :-'सा मागधी मूलभाषा' इस वाक्य से यह बोध होता है कि भगवान गौतम बुद्ध के समय मागधी ही मूल भाषा के रुप में जन सामान्य के बीच बोली जाती थी। कहा जाता है कि भाषा समय पाकर अपना स्वरूप बदलती है और विभिन्न रुपों में विकसित होती है।

मागधी का विकास

मगही का विकास 'मागधी' शब्द से हुआ है। ध्वनि परिवर्तन के कारण मागधी > मागही > मगही। आद्य अक्षर में स्वर संकोच होने के कारण मा > म के रुप में विकसित हुआ है। यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि मगही भाषा का विकास मागधी (पालि) अथवा नाटकों में प्रयुक्त मागधी प्राकृत से हुआ अथवा मगध जनपद में बोली जाने वाली किसी अन्य भाषा से। जहां तक नाटकों में प्रयुक्त होने वाली मागधी प्राकृत का सम्बन्ध है उससे मगही का विकास नहीं माना जा सकता है क्योंकि मागधी में र का ल और स का श हो जाता है। जबकि मगही में र औऱ ल तथा स आदि ध्वनियों का स्वतन्त्र अस्तित्त्व है। मगही में श का प्रयोग ही नहीं होता है। मागधी में ज का य हो जाता है, किन्तु मगही में यह ज के रुप में ही मिलता है, यथा - जन्म > जनम, जल > जल। मागधी में अन्वर्वती च्छ का श्च हो जाता है जबकि मगही में छ का छ ही रहता है, यथा - गच्छ > गाछ, पुच्छ > पूंछ, गुच्छक > गुच्छा। मागधी में क्ष का श्क हो जाता है जबकि मगही में क्ष का ख हो जाता है, यथा - पक्ष > पक्ख > पख, पंख, क्षेत्र > खेत्त > खेत। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है मागधी प्राकृत से मगही का विकास नहीं माना जा सकता है। पालि जिसे मागधी कहते हैं, उसमें मगही के अनेक शब्द मिलते हैं, यथा - निस्सेनी > निसेनी, गच्छ > गाछ, रुक्ख > रुख, जंखणे > जखने, तंखणे > तखने, कंखणे > कखने, कुहि, कहं > कहां, जहि, जहीं > जहां आदि।

किन्तु पालि और मगही की तुलनात्मक विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि पालि (मागधी) से भी मगही विकसित नहीं हुई है। सुनीति कुमार चटर्जी ने पश्चिमी मागधी अपभ्रंश से बिहारी बोलियों को विकसित माना है। दोहों की भाषा और मगही भाषा की तुलना से यह तथ्य सुनिश्चित होता है कि मगही सिद्धों की भाषा से विकसित हुई है। सर्वनाम में सरहपाद की भाषा में जहां को, जे का प्रयोग होता है, वही मगही के, जे का प्रयोग प्रचलित है। चार, चउदह, दस (दह) आदि संख्यावाचक शब्दों का प्रयोग मगही के समान है। सामयिक परिवर्तन के कारण प्रयोग मगही तथा सिद्धों की मगही में सामयिक परिवर्तन दृष्टिगत होता है किन्तु दोनों की प्रवृत्ति एवं प्रकृति में एकरुपता है।

सिद्धों की शब्दावलियां कुछ परिवर्तन के साथ मगही में प्रयुक्त होती है। यथा - अइसन, अप्पन, कइसे, लेली-लेली, लेलकइ, आइल > आयल, अइलइ, अन्धारि > अंधार, फटिला > फटिलइ, अधराति, अधरतिया, भइली, भेली भइली, आदि। सिद्ध साहित्य की पंक्तियां भी मगही के अत्यन्त निकट मालूम पड़ती है :

भाव न होइ अभाव ण जागइ।
अइस संवाहै को पतिआइ।।
आजि भूसु बंगाली भइली
णिअधरणी चण्डाली लली (चर्यापद 29)।

गठनात्मक रुप

सिद्धों की भाषाकार गठनात्मक रुप मगही से पूर्णत: एकनिष्ठ है। किसी भाषा की गठनात्मक स्वरूप का निरुपण, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण, उपसर्ग तथा प्रत्यय आदि से होता है। सिद्धों की भाषा की संज्ञा, सर्वनाम, मगही के समान ही हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि सिद्धों की भाषा से ही मगही का भाषिक रुप विकसित है। सिद्धों की भाषा और मगही में पर्याप्त समरुपता है। उदाहरण के लिये यर्यापद की कुछ पंक्तियां देखी जा सकती है:

सरह भषइ जप उजु भइला
(सरहपा चर्यापद)

नाना तरुवर माउलिल ते गअणत लालेगि डालि।
(सरहपा चर्यापद)

आइल गराहक अपने बहिआ।
(बिरुआ, चर्यापद)

उपर्युक्त पंक्तियों में सिद्धों ने वर्तमान भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय "इल' का प्रयोग किया है। ऐसे प्रयोग आधुनिक मगही में भी मिलते हैं। मागधी अपभ्रंश से आधुनिक मगही पूर्णत: सम्बद्ध है। अपभ्रंश में प्रयुक्त विभक्तियुक्त संज्ञापदों के रुप मगही में पाये जाते हैं, यथा - "घरे में दिनरात बइठल ही। बाबू जी घरे न हथुन।" अपभ्रंश काल में विभक्तिबोधक पर सर्गों का प्रयोग होने लगा था, जिनका विकास अन्य भाषाओं के साथ मगही में भी हुआ। इसी प्रकार संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा क्रिया आदि का विकास मागधी (पश्चिमी) अपभ्रंश से हुआ। अपभ्रंश में तत्सम शब्दों के बहिष्कार की प्रकृति दृष्टिगत होती है, आधुनिक मगही में भी यह प्रवृत्ति वर्तमान है। मगही के तद्भव और देशी शब्द-तन्त्र मुख्यत: प्राकृत और अपभ्रंश के शब्द-तन्त्र के ही विकसित रुप हैं। यहां यह बता देना समीचीन है कि सिद्ध साहित्य के रुप में प्राप्त मगही के प्राचीनकालिक स्वरूप के अनन्तर उसके आधुनिक रुप ही मिलते हैं, मध्यकालीन स्वरूप अप्राप्त है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भारत की भाषा का सर्वेक्षण, खण्ड 5 भाग 2, पृ. 123

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