दक्षिण भारत 1565-1615  


दक्षिण भारत का इतिहास 1565 से 1615 तक

बहमनी साम्राज्य के विघटन के बाद अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा नामक तीन शक्तिशाली रियासतें उभरी और उन्होंने मिलकर 1565 में तालिकोट के निकट बन्नीहट्टी की लड़ाई में विजयनगर को बुरी तरह पराजित किया। विजय के पश्चात् इन रियासतों ने पुराने तौर-तरीक़े अपना लिए। अहमदनगर और बीजापुर दोनों ने उपजाऊ शोलापुर पर अपना-अपना दावा किया। युद्ध और विवाह सम्बन्ध दोनों में से कोई भी इस समस्या को सुलझाने में सहायक नहीं हुआ। दोनों रियासतों की महत्त्वाकांक्षा बीदर को हस्तगत करने की थी। अहमदनगर अपने उत्तर में स्थित बरार को भी हथियाना चाहता था। वस्तुतः बहमनी सुल्तानों के वंशज निज़ामशाहियों ने दक्कन में प्रधानता नहीं तो कम से कम बेहतर स्थिति का दावा किया आरम्भ किया। उनके इस दावे का विरोध के केवल बीजापुर ने किया बल्कि गुजरात के सुल्तानों ने भी किया जिनकी नज़र बरार के साथ-साथ समृद्ध कोंकण प्रदेश पर भी थी। गुजरात के सुल्तानों ने अहमदनगर के विरुद्ध बरार को सक्रिय सहायता दी और दक्कन में शक्ति-संतुलन को रखने के लिए अहमदनगर से युद्ध भी किया। बीजापुर और गोलकुण्डा में भी नालदुर्ग के लिए संघर्ष हुआ।

दक्षिणी राज्य और मराठा

1572 में मुग़लों द्वारा गुजरात विषय से एक नयी परिस्थिति उत्पन्न हो गई। गुजरात विजय दक्कन विजय की पूर्व-पीठिका हो सकती थी। लेकिन अकबर कहीं और व्यस्त था, और इस मौक़े पर दक्कन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था। अहमदनगर ने मौक़े का लाभ उठाकर बरार हथिया लिया। वास्तव में अहमदनगर और बीजापुर ने एक समझौता कर लिया जिसके अंतर्गत बीजापुर को विजयनगर के इलाक़ों पर दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार करने की छूट मिल गई और अहमदनगर ने बरार को रौंद डाला। गोलकुण्डा भी विजयनगर साम्राज्य के क्षेत्र में अपनी सीमाओं का विस्तार करना चाहता था। इस प्रकार सभी दक्कनी रियासतें विस्तारवादी थीं। इस स्थिति में एक और महत्त्वपूर्ण बात दक्कन में मराठों का बढ़ता महत्त्व था। जैसा कि हम देख चुके हैं, बहमनी शासकों ने हमेशा मराठा सेनाओं को सहायक सेना के रूप में रखा था। इसे बारगीर (या सामान्यतः बारगी) कहा जाता था। स्थानीय स्तर पर राजस्व कार्य ब्राह्मणों के हाथों में था। मोरे, निम्बालकर, घाटगे जैसे कुछ पुराने मराठा वंशों ने बहमनी सुल्तानों की सेना में रहकर मनसब और जागीरें भी प्राप्त की थी। इनमें से अधिकांश शक्तिशाली ज़मींदार थे। जिन्हें दक्कन में देशमुख कहा जाता था। परन्तु उनमें न तो कोई राजपूतों की भाँति स्वतंत्र शासक था और न उनमें से किसी के पास बड़ा राज्य था। दूसरे वे अनेक वंशों के नेता भी नहीं थे, जिनकी सहायता पर वे निर्भर कर सकते। अतः अधिकांश मराठा सरदार सैनिक साहसिक थे, जो परिस्थिति के अनुसार अपनी स्वामीभक्ति बदल सकते थे। फिर भी मराठा दक्कन के ज़मींदारों की रीढ़ थे और उनकी स्थिति उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों के राजपूतों के समान थी। सोलहवीं शताब्दी के मध्य में दक्कनी राज्यों ने मराठों को अपनी ओर मिलाने की निश्चित नीति अपनायी। दक्कन की तीनों बड़ी रियासतों ने मराठा सरदारों को नौकरी और बड़े पद दिये। बीजापुर का इब्राहिम आदिलशाह जो 1555 में गद्दी पर बैठा था, इस नीति को अपनाने वालों में अग्रणी था। कहा जाता है कि उसके पास 30,000 मराठों की सहायक (बारगी) सेना थी, और वह राजस्व के मामलों में मराठों को हर स्तर पर छूट दिया करता था। इस नीति के अंतर्गत पुराने वंशों पर तो कृपा बनी ही रही, कई नये वंश भी बीजापुर रियासत में महत्त्वपूर्ण हो गए। जैसे भोंसले, जिनका वंशगत नाम घोरपड़े था, डफ्ले ( अथवा चह्वान) आदि। राजनयिक वार्ताओं में मराठी ब्राह्मणों का उपयोग भी नियमित रूप से किया जाता था। उदाहरण के लिए अहमदनगर के शासक ने कणकोजी नरसी नामक ब्राह्मण को पेशवा की उपाधि दी। अहमदनगर और गोलकुण्डा में भी मराठों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

अतः यह स्पष्ट है कि ज़मींदार वर्ग और लड़ाकू जातियों के साथ मित्रता की नीति अकबर-कालीन मुग़ल साम्राज्य से बहुत पहले दक्कन की रियासतों ने अपना ली थी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अबीसीनियाई

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