मुग़ल काल 3  


शेरशाह

(1540-55)

शेरशाह 67 वर्ष की वृद्धावस्था में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उसके प्रारंभिक जीवन पर विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। उसका वास्तविक नाम फ़रीद ख़ाँ था और उसका पिता जौनपुर में एक छोटा ज़मींदार था। फ़रीद ने पिता की जागीर की देखभाल करते हुए काफ़ी प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया। इब्राहिम लोदी की मृत्यु और अफ़ग़ान मामलों में हलचल मच जाने पर वह एक शक्तिशाली अफ़ग़ान सरदार के रूप में उभरा। 'शेरख़ाँ' की उपाधि उसे उसके संरक्षक ने एक शेर मारने पर दी थी। जल्दी शेरख़ाँ बिहार के शासक का दाहिना हाथ बन गया। वह वास्तव में बिहार का बेताज बादशाह था। यह सब बाबर की मृत्यु से पहले घटित हुआ था। इस प्रकार शेरख़ाँ ने अचानक ही महत्त्व प्राप्त कर लिया था।

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