मान सिंह  

मान सिंह
मान सिंह
पूरा नाम मान सिंह
जन्म 21 दिसम्बर, 1550 ई.
जन्म भूमि आमेर, राजस्थान (मुग़ल काल)
मृत्यु तिथि 6 जुलाई, 1614 ई.
पिता/माता पिता- भगवानदास, माता- रानी भगवती बाई
धार्मिक मान्यता हिन्दू
प्रसिद्धि अकबर के नवरत्नों में से एक तथा राजपूत सरदार
संबंधित लेख अकबर, मुग़ल साम्राज्य, राणा प्रताप, राजपूत साम्राज्य, राजपूताना
अन्य जानकारी जब राजा भगवानदास पंजाब के सूबेदार नियत हुए थे, तब सिंध के पार सीमांत प्रान्त का शासन कुँवर मानसिंह को दिया गया था। 1576 ई. के अन्त में मानसिंह बादशाह के आदेश से राणा प्रताप को दण्ड देने पर नियत हुए थे।

मान सिंह (जन्म- 21 दिसम्बर, 1550 ई., आमेर, राजस्थान; मृत्यु- 6 जुलाई, 1614 ई.) राजा भगवानदास के पुत्र थे।[1] अपनी बुद्धिमानी, साहस, सम्बन्ध और उच्च वंश के कारण अकबर के राज्य के स्तम्भों और सरदारों के अग्रणी थे। इनके कार्यों और व्यवहार से इन्हें बादशाह कभी फर्जद[2]और कभी मिरज़ा राजा के नाम से पुकारते थे[3]

राणा और मानसिंह का युद्ध

सन 1576 ई. के अन्त में मानसिंह राणा कोका (महाराणा प्रतापसिंह) को दण्ड देने पर नियत हुए। सन् 1577 ई. के आरम्भ में गुलकन्द के पास, जिसे चित्तौड़ के अनन्तर बनवाया था, घोर युद्ध हुआ। इसमें राजा रामसाह ग्वालियरी पुत्रों के साथ मारा गया। इसी मार–काट में राणा और मानसिंह का सामना होने पर युद्ध हुआ और घायल होने पर राणा भाग गए। राजा मानसिंह ने उनके महलों में उतर कर हाथी रामशाह को[4] दूसरी लूट के साथ दरबार भेजा। परन्तु जब मानसिंह ने उस प्रान्त को लूटने की आज्ञा नहीं दी, तब बादशाह ने इन्हें राजधानी में बुलाकर दरबार आने की मनाही कर दी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. राजा भगवान दास के भाई जगतसिंह के पुत्र थे, जिन्होंने स्वयं नि:सन्तान होने के कारण इन्हें दत्तक ले लिया था। मानसिंह पहले पहल संवत 1619 में अकबर के दरबार में गए थे
  2. पुत्र
  3. यह सन् 1562 ई. में बादशाह के साथ आगरे आए थे, सन् 1572 ई. में यह बादशाह के साथ गुजरात की चढ़ाई पर भी गए थे। जब बादशाह पाटन से बीस कोस इधर सिरोही से आगे डीसा दुर्ग पहुँचे, तब समाचार मिला कि शेर ख़ाँ फ़ौलादी सपरिवार तथा ससैन्य इधर जा रहा है। कुँवर मानसिंह उस पर भेजे गए और उन्होंने उसे परास्त कर भगा दिया। (इलि. डाउ., जि. 5श पृ. 342)। इसके अनन्तर सरनाल युद्ध में तथा गुजरात विजय में योग दिया। इसके दो वर्ष अनन्तर सन् 1575 ई. में डूँगरपुर तथा आस–पास के राजाओं का दमन करने के लिए भेजे गए, जिनके अधीनता स्वीकार कर लेने पर ये उदयपुर के मार्ग से लौटे। यही महाराणा प्रतापसिंह से इन्होंने अपने को अपमानित किया गया समझा था (अकबरनामा, इलि. डाउ., जि. 6, पृ. 42)। इसी के अनन्तर अकबर बादशाह ने महाराणा पर इसका बदला लेने के लिए चढ़ाई की थी
  4. जो उसके प्रसिद्ध हाथियों में से था
  5. जो कि काबुल का शासनकर्ता था
  6. यह अंश अकबरनामा में (जि. 3, पृ. 640) से लिया हुआ है। भिन्नता इतनी है कि प्रतापदेव के स्थान पर प्रताप राव और वीरसिंह के बदले में नरसिंह है। (इलि. डाउ., जि. 6, पृ. 88-9)
  7. बिहार तथा बंगाल की राजा मानसिंह की सूबेदारी का पूरा वर्णन स्टअर्ट की 'हिस्ट्री ऑफ़ बंगाल' (पृ0 114-121) में दिया है।
  8. अकबरनामा, इलि0 डाउ0, जि0 6, पृ0 85-7
  9. जहाँ पर उन्होंने शरण ली थी
  10. अकबरनामा, इलि. डाउ., जि. 6, पृ. 86-7।
  11. कूचबिहार से तात्पर्य है। इसी वर्ष ये घोड़ाघाट के पास अधिक बीमार हो गए थे। अफ़ग़ानों ने बलवा किया, पर इनके पुत्र हिम्मतसिंह ने इन्हें परास्त कर दिया।
  12. जो कि अल्पवयस्क था
  13. जो शारीरिक सुख, मद्यपान और बुरे संग–साथ के कारण बहुत दिन तक अजमेर में ठहर कर उदयपुर चला गया
  14. अकबरनामा में लिखा है कि जब जहाँगीर आगरा होता हुआ इलाहाबाद जा रहा था, तब वह अपनी दादी मरिअम मकानी से नियमानुसार मिलने नहीं गया। इससे दुःखित होकर वह मिलने के लिए आ रही थी, कि वह झट से प्रयाग चला गया। (इलि. डा., जि. 6, पृ. 99)
  15. 47वें वर्ष में उसमान का विद्रोह शान्त किया और 48वें वर्ष में मघ राजा और कैदराय को परास्त किया। (तकमीले अकबरनामा, इलि. डा., जि. 6, पृ. 106,9,11)
  16. जो कि प्रजा में युवराज माना जाता था
  17. बिकायः असदबेग, इलि. डा., जि. राजा 6, पृ. 170-3।
  18. सं. 1686 वि. सन् 1630 ई.
  19. राजा मानसिंह की पन्द्रह सौ रानियों में से साठ साथ में सती हो हुई थीं।
  20. जो बहुत दिनों से चला जाता है
  21. नामक एक फ़कीर जो वहाँ पर रहता था
  22. इनके वृत्तान्त के लिए 38वाँ निबन्ध देखिए, जिसका शीर्षक 'मिरज़ा राजा बहादुरसिंह कछवाहा' है। तुजुके जहाँगीरी, पृ. 130 में भी इनका उल्लेख है।

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