मुराद बख़्श  

मुराद बख़्श, शाहजहाँ और मुमताज़ महल (नूरजहाँ) का सबसे छोटा पुत्र था। उसका जन्म 1624 ई. में हुआ। वह युवावस्था प्राप्त करने पर अत्यन्त ही वीर, साहसी और युद्ध-प्रिय युवक सिद्ध हुआ। उसने कांगड़ा घाटी में एक विद्रोह को दबाया और बल्ख पर अधिकार कर लिया। हालाँकि बाद में उसे वहाँ से लौट आना पड़ा। 1657 ई. में जब शाहजहाँ अस्वस्थ हुआ, उस समय मुराद गुजरात का प्रान्तीय शासक था। वह दुस्साहसी और अधीर प्रवृत्ति का युवक था। अपने सबसे बड़े भाई दारा शिकोह को उत्तराधिकार से वंचित रखने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होकर सूरत को लूटा और अपने को सम्राट घोषित कर दिया। उसने अपने नाम से सिक्के भी ढलवाये। किन्तु शीघ्र ही बड़े भाई औरंगज़ेब के समझाने पर उसने इस आधार पर औरंगज़ेब का साथ दिया कि साम्राज्य का विभाजन औरंगज़ेब व उसके मध्य में किया जायेगा।

शाहजहाँ की चाहत

शाहजहाँ के चार पुत्र थे और जब शाहजहाँ 1657 ई. में अस्वस्थ हुआ, उस समय चारों बालिग थे। दारा शिकोह की आयु 43 वर्ष की थी; शाहशुजा की आयु 41 वर्ष, औरंगज़ेब की आयु 39 वर्ष तथा मुराद की आयु 33 वर्ष की थी। शाहजहाँ की दो पुत्रियाँ भी थी-जहाँआरा और रोशनआरा। जहाँआरा, दारा शिकोह का पक्ष लेती थी तथा रौशनारा औरंगज़ेब के दल में मिल गई थी। सभी भाइयों को प्रान्तों के शासकों तथा सैनाओं के सेनापतियों के रूप में ग़ैर सैनिक तथा सैनिक मामलों का काफ़ी अनुभव प्राप्त हो चुका था। परन्तु उनमें वैयक्तिक गुणों एवं योग्यता को लेकर भेद था। सबसे बड़े पुत्र दारा शिकोह पर शाहजहाँ विश्वास करता था और उसे ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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