उरग  

उरग पृष्ठवंशी जंतुओं का एक वर्ग है। सर्प, छिपकली, कछुआ, घड़ियाल, ये सभी उरग वर्ग के जंतु हैं। वर्तमान काल में तो इस वर्ग के जंतु बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं और इनकी संख्या भी अधिक नहीं है, किंतु मध्यकल्प नामक भूतकाल में ये नि:संदेह पृथ्वी पर के सबसे अधिक महत्वपूर्ण जंतु थे। इनमें से बहुतों की नाप वर्तमान काल के हाथी की नाप से बड़ी थी।

उरगवंश की उत्पत्ति कार्बनप्रद युग में उभयचर वर्ग के आवृतशीर्ष अनुवर्ग (स्टेगोसिफ़ेलिया ऐंफ़िबिजा) से हुई और गिरियुग (पर्मियन), रिक्ताश्म (ट्राइऐसिक) तथा महासरट (जुरैसिक) युगों में इनका बहुत विकास हुआ। आद्य उरगों का विकास दो दिशाओं में पृथक्‌ पृथकृ हुआ। कुछ आद्य उरग स्तनधारी जंतुओं के सदृश होते गए और खटीयुग (क्रिटेशस युग) में आद्य स्तनधारी जंतुओं में परिणत हो गए और कुछ से उरगवर्ग और पक्षिवर्ग के जंतु उत्पन्न हुए। रक्ताश्म (ट्राइऐसिक) और महासरट (जुरैसिक) युगों में उरगवंश के जंतु बड़ी अधिकता से पृथ्वी पर फैले हुए थे। इनमें से अधिकांश सूखी भूमि पर रहनेवाले थे, परंतु कुछ जल में रहनेवाले और कुछ उड़नेवाले भी थे। उरगों के अधिकांश समूह लुप्त हो चुके हैं, केवल पाँच गण वर्तमान काल में पाए जाते हैं। ये हैं : 1-गोधिकानुगण (लैसरटिलिया); 2-अह्मनुगण (ओफ़िडिया); 3-परिवर्मिगण (किलोनिया); 4-मकरगण (क्रोकोडिलिया); 5-पल्याभगण (रिंगकोसिफ़ैलिया) जिसमें केवल स्फानदंत प्रजाति (स्फ़ीनोडॉन) अब जीवित हैं।

उरगवर्ग की परिभाषा कठिन है, क्योंकि आद्य उरग आवृतशीर्ष अनुवर्ग (स्टेगोसिफ़ेलिया) के सदृश थे; इनसे वे विकसित हुए और पीछे के उरगों में से कुछ स्तनधारियों के सदृश हो गए ओर कुछ पक्षियों के। शेष वर्तमानकाल के ओर कुछ भूतकाल के उरग (जो लुप्त हो चुके हैं) विकसित हुए। इस कारण कुछ विद्वानों की यह धारणा है कि उरग वर्ग तोड़कर तीन स्वतंत्र वर्गों का निर्माण करना चाहिए। ये हैं :

1-आद्यसरट वर्ग (प्रोटोसॉरिया), जिनमें उभयचर (ऐंफिबिया) सदृश उरग रखे जाएँ; 2- थेरीप्सिडा, जिनमें स्तनधारी सदृश उरग और स्तनधारी जंतु रखे जाएँ; और 3- पक्षिसरीसृप, जिनमें विशिष्ट उरग तथा पक्षिवर्ग रखे जाएँ। परंतु इसमें संदेह नहीं कि यह वर्गीकरण पुराने वर्गीकरण से भी कम संतोषजनक है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 130 |

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