कंकनी  

कंकनी (टिनौफ़ोरा) अपृष्ठवंशी जंतुओं का एक छोटा संघ है, जो कुछ ही समय पहले तक आंतरगुही[1] समुदाय से घनिष्ठ संबंध के कारण उसी के उप-समुदाय के अंतर्गत रखा जाता था। इसके सभी सदस्य समुद्री स्वतंत्रजीवी, स्वतंत्र रूप से तैरने वाले तथा बहुत ही पारदर्शी होते हैं। ये बहुविस्तृत हैं और उष्ण भागों में बहुतायत से पाए जाते हैं।

नामकरण

इसे सामन्यत: समुद्री अखरोट[2] या कंकत-गिजगिजिया[3] कहते हैं। पहला नाम आकार के कारण तथा दूसरा उसके पारदर्शी तथा कोमल होने और उन पर 'कंकत' (कंघी) जैसे चलांगों के कारण है। ये 'कंघियाँ' शरीर पर लाक्षणिक रूप से आठ पंक्तियों में स्थित होती हैं। कुछ जातियाँ फीते जैसी चपटी भी होती हैं, जैसे- 'रति-वलय' (वीनस गर्डिल), जिसकी लंबाई 6 इंच से लेकर 4 फुट तक होती है।[4]

लक्षण

'कंकनी' समुदाय के साधारण लक्षण निम्नलिखित हैं-

  1. शरीर द्विअरीय विधि से उदग्र अक्ष पर संमित होता है।
  2. शरीर के निर्माण में दो मुख्य स्तरों, बहिर्जनस्तर[5] तथा अंतर्जनस्तर[6] का होना, किंतु साथ ही इनके बीच में बहुविकसित मध्यश्लेष[7] का स्तर होना, जिसमें अनेक कोशिकाएँ होती हैं। इन कोशिकाओं का पृथक्करण बहुत प्रारंभिक अवस्था में हो जाता है जिससे इसको अधिकांश लेखक एक अलग स्तर मध्यचर्म मानते हैं। इस प्रकार कंकनी समुदाय त्रिस्तरीय कहा जा सकता है। मध्यचर्म की कोशिकाओं से पेशीय कोशिकाएँ बनती हैं।
  3. समुदाय में शरीर विखंडित[8] नहीं होता।
  4. शरीर बहुत कुछ गोलाकार या लंबी नाशपाती जैसा होता हैं, किंतु कुछ सदस्य चपटे भी होते हैं। शरीर के ऊपरी तल पर पक्ष्म-कोशिकाओं[9] से बनी 'कंघियों' की आठ पंक्तियाँ होती हैं। ये ही इन जीवों के चलांग हैं।
  5. सुच्यंग अथवा डंक[10] सर्वथा अनुपस्थित रहते हैं।
  6. पाचक अंगों के अंतर्गत मुख, 'ग्रसनी', आमाशय तथा शाखित नलिकाएँ रहती हैं।
  7. स्नायु संस्थान आंतरगुही की भाँति फैला हुआ और जाल जैसा तथा मुख की विपरीत दिशा में स्थित्यंग[11] नामक संवेदांग की उपस्थिति होती है।
  8. ये जीव द्विलिंगी होते हैं; जननकोशिकाओं का निर्माण अंतर्जनस्तर से, कंकनीपंक्तियों के नीचे, होता है।
  9. परिवर्धन सरल तथा बिना किसी डिंभ (लार्वा) की अवस्था और पीढ़ियों के एकांतरण से होता है।[4]

इसके अतिरिक्त-अधिकांश कंकनियों में दो ठोस, लंबी स्पर्शिकाएँ होती हैं, जो प्रत्येक पार्श्व में स्थित एक अंधी थैली से निकलती हैं। इन स्पर्शिकाओं पर कुछ विचित्र कोशिकाएँ होती हैं, जिनको कॉलोब्लास्ट कहते हैं। प्रत्येक कॉलोब्लास्ट से एक प्रकार का लसदार द्रव निकलता है और इसमें कुंतलित कमानी के आकार की एक संकोची धागे जैसी रचना होती है, जो शिकार से लिपट जाती है और उसे पकड़ने में सहायक होती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

“खण्ड 1”, हिन्दी विश्वकोश, 1975 (हिन्दी), भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी, 329-331।

  1. सिलेंटरेटा
  2. सी वालनट
  3. कोम-जेली
  4. 4.0 4.1 4.2 4.3 कंकनी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 28 जनवरी, 2014।
  5. एक्टोडर्म
  6. एंडोडर्म
  7. मेसोग्लीआ
  8. सेगमेंटेड
  9. सिलिअरी सेल्स
  10. निमैटोसिस्ट
  11. स्टैटोसिस्ट
  12. प्ल्यूरोब्रैंकिया
  13. प्ल्यूरोब्रैकिया
  14. हॉर्मिफ़ोरा
  15. बोलिनॉप्सिस
  16. नीमियाप्सिस
  17. हाइड्रोज़ोओ
  18. ट्रेकिलाइनी
  19. टरबेलैरिया

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