उभयचर  

उभयचर (ऐंफ़िबिया) यह पृष्ठवंशीय प्राणियों का एक बहुत महत्वपूर्ण वर्ग है जो वर्गीकरण के अनुसार मत्स्य और सरीसृप वर्गों के बीच की श्रेणी में आता है। इस वर्ग के कुछ जंतु सदा जल पर तथा कुछ जल और थल दोनों पर रहते हैं। यह पृष्ठवंशियों का प्रथम वर्ग है, जिसने जल के बाहर रहने का प्रयास किया था। फलस्वरूप नई परिस्थितियों के अनुकूल इनकी रचना में प्रधानतया तीन प्रकार के अंतर हुए-(1) इनका शारीरिक ढाँचा जल में तैरने के अतिरिक्त थल पर भी रहने के योग्य हुआ। (2) क्लोम दरारों के स्थान पर फेफड़ों का उत्पादन हुआ तथा रक्तपरिवहन में भी संबंधित परिवर्तन हुए। (3) ज्ञानेंद्रियों में यथायोग्य परिवर्तन हुए, जिससे ये प्राणी जल तथा थल दोनों परिस्थितियों का ज्ञान कर सकें। उभयकर के कुछ विशेष लक्षण निम्नलिखित हैं : इनकी त्वचा पर किसी प्रकार का बाह्‌य कंकाल, जैसे शल्क, बाल इत्यादि नहीं होते और त्वचा आर्द्र होती है। मीनपक्षों के स्थान पर दो जोड़ी पाद होते हैं। इनमें दो नासाद्वार होते है, जो मुखगुहा द्वारा फेफड़ों से संबद्ध रहते हैं। हृदय में तीन वेश्म होते हैं। ये असमतापी जीव होते हैं। इनमें एक विशेष प्रकार का मध्यकर्ण पाया जाता है जिससे इन्हें वायुध्वनियों का ज्ञान होता है।

उभयचर वर्ग में लगभग 2,500 प्रकार के विभिन्न प्राणी सम्मिलित हैं, जिनको चार गुणों में विभाजित किया जाता है : सपुच्छा (कॉडेटा); विपुच्छा (सेलियंशिया); अपादा (ऐपोडा) और आवृतशीर्ष (स्टीगोसिफेलिया)।

सपृच्छा - इसके अंतर्गत न्यूट तथा सैलामैंडर आते हैं। इनका शरीर लंबा और सिर तथा धड़ के अतिरिक्त पूँछ भी होती है। बहुधा अग्र तथा पश्चपाद लगभग बराबर होते हैं। अधिकतर जलक्लोम तथा क्लोम दरारें आजीवन रहती हैं, परंतु कुछ में ये वयस्क अवस्था में लुप्त हो जाती हैं और श्वसन केवल फेफड़ों द्वारा ही होता है। ये प्राचीन काल में खटी युग (क्रिटेशस) तक पाए गए हैं। यद्यपि इनका साधारण आकार इनके पूर्वजों से मिलता जुलता है, फिर भी इनकी उत्पत्ति पर अधिक प्रकाश अभी तक संभव नहीं हो सका है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 126 |

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