अष्टपाद  

अष्टपाद (ऐरैकनिका) संधिपदा (आर्थोपोडा) प्राणिसमुदाय (फ़ाइलम) की एक श्रेणी है जिसके अंतर्गत नृप केकड़ा, मकड़ी, बिच्छू, अल्पिकाएँ (माइट) तथा किलनी या चिचड़ियाँ (टिक) आती हैं। इनमें चलने के लिए आठ टांगें होती हैं, इसीलिए ये अष्टपाद कहलाते हैं। अष्टपाद श्रेणी के सदस्य कीट श्रेणी के सदस्यों से भिन्न होते हैं। अष्टपादों की निम्नलिखित रचनात्मक विशेषताएँ हैं:

शरीर दो मुख्य भागों में विभक्त होता है। शरीर तथा वक्ष दोनों के विलयमान होने से अग्रभाग शिरोर (सेफ़ालोथेरैक्स) तथा पश्चभाग उदर कहलाता है। आंखे सरल होती हैं जिनकी संख्या 2 से 12 तक होती है, शिरोर में छह जोड़े अनुबंध (शरीर से जुड़े अंश) होते हैं, जिनमें प्रथम दो जोड़े ग्राहिका (केलिसेरा) और पादस्पर्शश्रृग (पेडिपैल्पस) के होते हैं। ये शिकार को घेरने तथा पकड़ने के काम आते हैं और अन्य शेष चार जोड़े चलनेवाली टांगें होती हैं। सभी अष्टपाद भोजन को चूसकर खानेवाले प्राणी होते हैं, अतएँव उनमें हन्विकाएँ (मैंडिबुल्स अथवा जबड़े) विद्यमान नहीं होतीं, स्पर्शक (ऐंटेनी) का अभाव होता है तथा अधिकांश में उदर पर कोई अनुबंध नहीं होता।

श्वास प्राय: पुस्तक फुफ्फुम (बुक लंग्स) द्वारा लिया जाता है (पुस्तक फ़ुफ्फुस एक प्रकार का कोष्ठकमय श्वासपथ है। ये कोष्ठक औदरिक तल पर गड्ढों में स्थित रहते हैं; उनमें पुस्तक के पृष्ठों की भांति कई पतले पत्रक होते हैं जिनमें होकर रक्त का परिभ्रमण होता रहता है)। इस समुदाय के सदस्य प्राय: मांसाहारी होते हैं। बिच्छु में विषग्रंथियाँ होती हैं जो एक खोखले एँक से संबद्ध रहती हैं।

अष्टपादों की कई जातियाँ अत्यंत प्राचीन शिलाओं में जीवाश्म के रूप में पाई गई हैं। वे नि:संदेह प्रवालादि युग (सिल्यूरियन पीरियड) में प्राय: आज की सी ही आकृति में विद्यमान थीं। अष्टपादों की लगभग 60,000 जतियों (स्पीशीज़) हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 292 |
  2. सं.ग्रं.-टी.जे.पार्कर ऐंड विलियम ए. हैसवेल: ए. टेक्स्टबुक ऑव जुऑलोजी, भाग1, ऑडहैम्स प्रेस, लिमिटेड, लंदन (1951); जॉन हेनरी कॉम्सटाक : दि सायंस ऑव लिविंग थिंग्स; चंपतस्वरूप गुप्त: जंतुविज्ञान; डी.आर.पुरी : प्राणिशास्त्र; रघुबीर : माध्यामिक प्राणिकी।

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